उत्तराखंड में सड़क हादसे: निर्दोष की मौत, इनोवा की रफ्तार और कानून-व्यवस्था की चिंताजनक तस्वीर

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की व्यस्त सड़कों पर एक बार फिर एक भयानक सड़क दुर्घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है। गुरुवार शाम करीब साढ़े सात बजे राजपुर रोड पर एक तेज रफ्तार इनोवा कार ने कई वाहनों से टकराते हुए एक निर्दोष व्यक्ति की जान ले ली और कई अन्य को गंभीर रूप से घायल कर दिया। इस हादसे ने न केवल स्थानीय लोगों में आक्रोश पैदा कर दिया, बल्कि पूरे उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर पुलिस ने आरोपी ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया है, वहीं दूसरी ओर राज्य में बढ़ते नशे में ड्राइविंग के मामलों, शराब नीति के कारण युवाओं का नशे की चपेट में आना और प्रशासन की राजस्व कमाने की होड़ ने निर्दोषों की जान लेने वाली ऐसी घटनाओं को बढ़ावा दिया है। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक है।

घटना की पूरी कहानी इस प्रकार है। आरोपी गुनीत सिंह, जो इंदर रोड का निवासी है, अपनी इनोवा कार (रजिस्ट्रेशन नंबर यूके07डीएफ1795) में सवार होकर राजपुर रोड की ओर बढ़ रहा था। अत्यधिक तेज गति के कारण पहले उसकी कार डीएल रोड पर एक अन्य कार (यूके07टीई2606) से टकरा गई, जिससे उसमें काफी क्षति हुई। इसके बाद इनोवा ने एक स्कूटर (यूके07एफएस5518) को टक्कर मार दी। इस स्कूटर पर सवार राहुल, नरेंद्र कुमार के पुत्र, जो अम्बेडकर नगर, डीएल रोड के रहने वाले हैं, गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत वैश नर्सिंग होम ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें एम्बुलेंस से मैक्स अस्पताल रेफर कर दिया गया।

इसी बीच, इनोवा की रफ्तार ने एक मोटरसाइकिल (यूके07एफआर5116) को भी अपनी चपेट में ले लिया। इस मोटरसाइकिल पर 48 वर्षीय रोहित फिलिप्स और उनके 22 वर्षीय पुत्र अनुज फिलिप्स सवार थे, जो ओल्ड सर्वे रोड, दलानवाला के निवासी हैं। दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें दून अस्पताल ले जाया गया। दुर्भाग्यवश, रोहित फिलिप्स का इलाज के दौरान निधन हो गया। पिता की मौत और पुत्र की गंभीर हालत ने पूरे परिवार को सदमे में डाल दिया। हादसे के बाद इनोवा कार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उसने आगे बढ़कर एक पार्किंग में खड़े मोटरसाइकिल (यूके05बी5133) और स्कूटर (यूके07डीडब्ल्यू0086) को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। अंत में, यह कार ओल्ड सर्वे रोड पर छबरा रेजिडेंस के गेट को तोड़ते हुए अंदर घुस गई, जहां उसने एक स्कूटर (यूके07एफएक्स1837) और एक कार (यूके07बीएन2255) को भी नुकसान पहुंचाया।

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी गुनीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया और उसके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। लेकिन यह गिरफ्तारी सिर्फ औपचारिकता लगती है, क्योंकि राज्य में ऐसे हादसों की संख्या लगातार बढ़ रही है और जिम्मेदारों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो रही। स्थानीय लोगों ने इस घटना पर भारी आक्रोश व्यक्त किया। सोशल मीडिया पर #JusticeForRohitPhillips जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक उत्तराखंड की सड़कें मौत के कुंड बनती रहेंगी? परिवार के सदस्यों ने न्याय की मांग की है और कहा है कि यह हादसा सिर्फ रफ्तार की वजह से नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर नशे और लापरवाही का नतीजा है।

यह घटना उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था की स्थिति की एक करुण चित्रण है। राज्य, जो पर्यटन, तीर्थयात्रा और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, आज सड़क दुर्घटनाओं का गढ़ बनता जा रहा है। 2025 में पूरे उत्तराखंड में 1846 सड़क हादसे दर्ज हुए, जिनमें 1242 लोगों की मौत हुई और 2056 घायल हुए। यह आंकड़े 2024 के मुकाबले बढ़े हुए हैं, जहां 1747 हादसे, 1090 मौतें और 1547 घायल थे। देहरादून जिले में अकेले 450 हादसे हुए, जिनमें 229 मौतें दर्ज की गईं। मुख्य कारण ओवरस्पीडिंग, हेलमेट और सीटबेल्ट न पहनना तथा देरी से मेडिकल मदद मिलना बताया जा रहा है। लेकिन असली समस्या गहरी है – बढ़ता नशे में वाहन चलाना।

देहरादून में नशे में ड्राइविंग के चालान 2024 के 1824 से बढ़कर 2025 में 4868 हो गए, यानी 166 प्रतिशत की भारी वृद्धि। अंडरएज ड्राइविंग के चालान भी 51 से 352 हो गए। ट्रैफिक पुलिस के अनुसार यह वृद्धि बेहतर निगरानी और तकनीकी उपायों के कारण है, लेकिन स्थानीय निवासी इसे खोखला तर्क मानते हैं। वे कहते हैं कि नई क्लबों और बारों के खुलने से युवा नशे में गाड़ी चलाते दिख रहे हैं। राजपुर रोड, मसूरी रोड जैसी जगहों पर सार्वजनिक नशा और वाहनों में शराब पीना आम हो गया है। एक स्थानीय महिला रीनू पॉल ने कहा, “चालान लगाने से समस्या नहीं रुक रही। जड़ पर हमला करने की जरूरत है।” यह दर्शाता है कि कानून-व्यवस्था सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सिमट गई है।

अब सवाल उठता है कि क्यों उत्तराखंड में नशे में ड्राइविंग के मामले बढ़ रहे हैं? इसका एक बड़ा कारण सरकारी स्तर पर शराब को राजस्व का स्रोत बनाना है। उत्तराखंड सरकार की नई एक्साइज पॉलिसी 2025-26 में धार्मिक स्थलों के पास शराब की दुकानें बंद करने का प्रावधान है, लेकिन साथ ही वाइनरी को बढ़ावा और स्थानीय रोजगार पर जोर दिया गया है। राज्य में प्रति पीने वाले व्यक्ति पर एक्साइज राजस्व 4217 रुपये है, जो पड़ोसी राज्यों दिल्ली (1842), हिमाचल (2988) और हरियाणा (3765) से कहीं ज्यादा है। अधिकारियों की होड़ है कि ज्यादा से ज्यादा शराब बिके, क्योंकि यह राजस्व का बड़ा स्रोत है। लेकिन यह गलत सामाजिक दृष्टिकोण है। शराब युवाओं और समाज को नशे की चपेट में डाल रही है, निर्दोषों की जान ले रही है।

सरकार कहती है कि शराब से राजस्व बढ़ेगा और विकास होगा, लेकिन हकीकत यह है कि नशा युवाओं का भविष्य बर्बाद कर रहा है। स्कूल-कॉलेज के छात्र नशे में गाड़ी चलाते पकड़े जा रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं, घरेलू हिंसा बढ़ रही है और सड़कें खून से लाल हो रही हैं। यह दृष्टिकोण गलत है क्योंकि राजस्व कमाने के नाम पर समाज को नष्ट करना नैतिक रूप से गलत है। शराब बेचकर पैसे कमाने से पहले सोचना चाहिए कि कितनी मांओं की गोद सूनी हो रही है, कितने बच्चे अनाथ हो रहे हैं। नशा न केवल स्वास्थ्य बिगाड़ता है, बल्कि दुर्घटनाओं का मुख्य कारण बनता है। भारत में सड़क दुर्घटनाओं में शराब का योगदान आधिकारिक आंकड़ों में कम दिखाया जाता है, लेकिन स्वतंत्र अध्ययनों में 20-30 प्रतिशत तक है। उत्तराखंड में भी यही स्थिति है।

अब सवाल यह है कि राजस्व के अन्य स्रोत क्यों नहीं अपनाए जाते? उत्तराखंड पर्यटन की धरती है। चारधाम यात्रा, हिमालयी ट्रेकिंग, एडवेंचर टूरिज्म से अरबों का राजस्व आ सकता है। हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, ऑर्गेनिक फार्मिंग, फल-फूल उत्पादन, हैंडीक्राफ्ट और आईटी सेक्टर को बढ़ावा देकर राजस्व बढ़ाया जा सकता है। युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देकर रोजगार सृजन किया जा सकता है। शराब पर निर्भरता छोड़कर पर्यावरण-अनुकूल उद्योगों पर फोकस करें तो समाज भी स्वस्थ रहेगा और अर्थव्यवस्था भी मजबूत। लेकिन अफसोस, अधिकारी राजस्व की आसानी देखकर शराब को बढ़ावा देते हैं, जो युवाओं को नशे में धकेल रहा है।

इस हादसे को समझने के लिए अतीत के कुछ उदाहरण देखें, जहां पुलिस और अधिकारियों की विफलता ने निर्दोषों की मौत को आम बनाया। अक्टूबर 2025 में देहरादून के राजपुर थाने के एसएचओ शंकी कुमार नशे में तीन वाहनों से टकरा गए। वे भागने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वीडियो वायरल होने पर सस्पेंड कर दिया गया। एक पुलिस अधिकारी खुद नशे में गाड़ी चलाए, तो आमजन से क्या उम्मीद? इसी तरह न्यू टिहरी में एक बीडीओ ने नशे में गाड़ी चलाकर एक स्थानीय महिला की जान ले ली। ऐसे मामलों में पुलिस ने सिर्फ औपचारिक कार्रवाई की, लेकिन गहरी जांच या जवाबदेही तय नहीं हुई।

पिछले दशक में उत्तराखंड में 11,000 से ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं में मौतें हुईं। कई मामलों में नशे में ड्राइविंग साबित हुई, लेकिन पुलिस ने चालान या गिरफ्तारी तक सीमित रखा। उदाहरण के लिए, नैनीताल और हरिद्वार में कई हादसों में युवा ड्राइवर नशे में पकड़े गए, लेकिन उनके लाइसेंस रद्द नहीं हुए या परिवार को मुआवजा देने में देरी हुई। एक मामला जहां एक नाबालिग ने पॉर्शे जैसी लग्जरी कार से हादसा किया (हालांकि वह पुणे का था, लेकिन उत्तराखंड में भी अंडरएज ड्राइविंग बढ़ी है), पुलिस की निगरानी की कमी उजागर हुई। यहां पुलिस ने कई बार सार्वजनिक नशे पर अभियान चलाया – पिछले 15 दिनों में 258 लोगों को पब्लिक ड्रिंकिंग के लिए पकड़ा, 87 नशे में ड्राइविंग के लिए गिरफ्तार – लेकिन समस्या जड़ से नहीं हल हुई।

इन सभी मामलों में एक बात आम है – कोई जवाबदेही तय नहीं होती। पुलिस अधिकारी, ट्रैफिक विभाग या एक्साइज विभाग के कर्मी हादस होने पर कहते हैं “जांच चल रही है”, लेकिन महीनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। आरोपी जमानत पर बाहर, परिवार न्याय की भीख मांगता रहता है। यह प्रणालीगत विफलता है। अगर पुलिस खुद नशे में पकड़ी जाती है, तो आमजन कैसे सुरक्षित महसूस करे? प्रशासन को जवाबदेही तय करनी चाहिए – हर हादसे में एसपी या डीएम स्तर पर जांच, दोषी अधिकारियों पर सस्पेंशन और विभागीय कार्रवाई।

उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था की यह स्थिति चिंताजनक है। राज्य में युवा आबादी बढ़ रही है, पर्यटक आ रहे हैं, लेकिन सड़कें मौत का जाल बनी हुई हैं। नशे की लत युवाओं को बर्बाद कर रही है। सरकार को एक्साइज पॉलिसी पर पुनर्विचार करना चाहिए। शराब की दुकानें कम करें, लेकिन राजस्व के लिए अन्य क्षेत्रों जैसे पर्यटन, ऊर्जा और कृषि पर निवेश बढ़ाएं। युवाओं के लिए जागरूकता अभियान चलाएं – स्कूलों में रोड सेफ्टी शिक्षा, नशे के खिलाफ कैंपेन।

इस हादसे में रोहित फिलिप्स जैसा निर्दोष मर गया, राहुल और अनुज जैसे युवा घायल हुए। उनके परिवार का दर्द असहनीय है। क्या सरकार अब भी राजस्व की होड़ में युवाओं को नशे की ओर धकेलती रहेगी? क्या पुलिस और प्रशासन जवाबदेही तय करेगी? समय आ गया है कि उत्तराखंड कानून-व्यवस्था को मजबूत करे, नशे को जड़ से उखाड़े और वैकल्पिक राजस्व स्रोत अपनाए। अन्यथा ऐसे हादसे जारी रहेंगे और निर्दोषों की मौत का सिलसिला थमेगा नहीं।

यह घटना सिर्फ एक चेतावनी है। पूरे राज्य में सड़क सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। ओवरस्पीडिंग पर कैमरे लगाएं, नशे की जांच के लिए रैंडम चेकिंग बढ़ाएं, लेकिन सबसे जरूरी है सामाजिक बदलाव। शराब को प्रोत्साहन देना बंद करें। समाज को नशा मुक्त बनाएं। युवाओं को रोजगार दें, ताकि वे नशे की ओर न मुड़ें। पुलिस को जवाबदेह बनाएं – हर हादसे के बाद रिपोर्ट सार्वजनिक करें, दोषियों पर सख्ती करें।

अतीत के उदाहरणों से सीख लें। ऐसे में कोई जवाबदेही न हो तो अपराध बढ़ते हैं। सरकार को एक स्वतंत्र रोड सेफ्टी कमीशन बनाना चाहिए, जो हर हादसे की जांच करे और सिफारिशें लागू करे।

अंत में, वैकल्पिक राजस्व से विकास करें। कानून-व्यवस्था मजबूत करें, ताकि ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं। युवा पीढ़ी को नशे से बचाएं, क्योंकि वे ही राज्य का भविष्य हैं। अगर आज नहीं चेते तो कल बहुत देर हो जाएगी।

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