नई दिल्ली/वाशिंगटन/बीजिंग, 31 मार्च 2026 – फरवरी 28, 2026 को शुरू हुए अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी) के एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन ईरान के खिलाफ हवाई अभियान अभी भी पूरे जोर पर है। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के मिसाइल बेस, न्यूक्लियर साइट्स, डिफेंस इंडस्ट्री, स्टील प्लांट्स और कमांड सेंटर्स पर सैकड़ों हमले किए हैं, जिसमें सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेता मारे गए। ईरान की ओर से जवाबी हमले जारी हैं – इजरायल पर मिसाइल-ड्रोन बरसाए जा रहे हैं, सऊदी अरब में अमेरिकी बेस पर हमले में अमेरिकी सैनिक घायल हुए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ गया है। क्षेत्रीय युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, जिसमें लेबनान (हिजबुल्लाह) और गल्फ देश भी शामिल हो गए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू में रिजीम चेंज का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब डिप्लोमेसी की बात कर रहे हैं। फिर भी ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव को ‘अनुचित और अधिकतमवादी’ बताते हुए खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने किसी भी बातचीत से इनकार किया है। युद्ध अब दिन 32 में प्रवेश कर चुका है और अमेरिका-इजरायल की संयुक्त ताकत ईरान की मिसाइल क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा चुकी है, लेकिन ईरान छोटे-छोटे मिसाइल हमलों से इजरायली नागरिकों को लगातार अलर्ट पर रखे हुए है।
वर्तमान युद्ध स्थिति: हवाई हमले जारी, क्षेत्रीय फैलाव
अमेरिका-इजरायल ने युद्ध के पहले 12 घंटों में ही 900 से ज्यादा हमले किए। उसके बाद लगातार स्ट्राइक्स हो रहे हैं – यज्द मिसाइल बेस, पर्चिन कॉम्प्लेक्स, बुसहर एयरपोर्ट, स्टील फैक्टरियां और मरीन इंडस्ट्री टारगेट्स पर हमले किए गए। ईरान की मिसाइल स्टॉक का एक तिहाई नष्ट या क्षतिग्रस्त हो चुका है। इजरायल ने 3,000 से ज्यादा स्ट्राइक्स का दावा किया है।
ईरान की जवाबी कार्रवाई: इजरायल पर रोजाना 5-11 मिसाइल बैराज, हाइफा ऑयल रिफाइनरी पर हमले, सऊदी बेस पर हमले (10 अमेरिकी सैनिक घायल)। होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग प्रभावित, ईरान ने तेल निर्यात पर चीनी युआन में टोल लेना शुरू किया। लेबनान में हिजबुल्लाह के हमले बढ़े। कुल मौतें: ईरान में सैकड़ों (कुछ रिपोर्ट्स में 2000+), इजरायल में 16+, गल्फ देशों में 50+। अमेरिका के 13+ सैनिक मारे गए।
अमेरिका ने क्षेत्र में 50,000+ सैनिक तैनात कर दिए – दो एयरक्राफ्ट कैरियर्स, 200+ लड़ाकू विमान, मरीन्स और 82nd एयरबोर्न। लेकिन यह तैनाती अमेरिकी सैन्य संसाधनों को खींच रही है, जो चीन को रोकने के लिए इंडो-पैसिफिक में जरूरी हैं।
रूस और चीन का रुख: कड़ी निंदा, लेकिन सीधा हस्तक्षेप नहीं
रूस और चीन ने अमेरिका-इजरायल हमलों की तीखी आलोचना की है। दोनों देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और तुरंत युद्धविराम की मांग की। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने फोन पर बातचीत में डिप्लोमेसी पर जोर दिया। चीन ने कहा कि वह क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है और गल्फ देशों की संप्रभुता का सम्मान किया जाना चाहिए। रूस ने कहा कि ईरान पर न्यूक्लियर हथियार बनाने का कोई सबूत नहीं है।
दोनों देशों ने ईरान को सीधा सैन्य समर्थन नहीं दिया। रूस चुपके से सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन टेक्नोलॉजी दे रहा है, जिससे ईरान के टारगेटिंग में मदद मिल रही है। चीन ईरानी तेल खरीद रहा है और बीडू नेविगेशन सिस्टम उपलब्ध करा रहा है। लेकिन दोनों ही प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से दूर हैं – रूस अपना यूक्रेन युद्ध संभाल रहा है, चीन आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है। दोनों ने ईरान को मध्यस्थता में शामिल करने का सुझाव दिया है ताकि अमेरिकी प्रस्ताव ‘धोखा’ न हो।
चीन के लिए अवसर: रणनीतिक लाभ, अमेरिका को कमजोर करने का मौका
यह युद्ध चीन के लिए कई रणनीतिक अवसर पैदा कर रहा है। सबसे बड़ा – अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व में फंसना। अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स, बॉम्बर्स और मिसाइल डिफेंस सिस्टम (THAAD) मध्य पूर्व में खिंच गए हैं, जो चीन को इंडो-पैसिफिक में दबाव डालने का मौका दे रहे हैं। चीन के विशेषज्ञों का कहना है कि यह अमेरिका की ‘डिटरेंस’ क्षमता को कमजोर कर रहा है।
दूसरा – ऊर्जा सुरक्षा। ईरानी तेल सस्ते दामों पर चीन पहुंच रहा है। युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन चीन रूस से ओवरलैंड सप्लाई बढ़ा रहा है। होर्मुज स्ट्रेट संकट में चीन मध्यस्थ की भूमिका निभाकर गल्फ देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी छवि मजबूत कर सकता है।
तीसरा – कूटनीतिक लाभ। चीन ने मध्य पूर्व में मध्यस्थता की पेशकश की है। वह अमेरिका की ‘आक्रामकता’ की आलोचना कर रहा है और खुद को शांतिप्रिय शक्ति के रूप में पेश कर रहा है। रूस-चीन ‘नो-लिमिट्स’ पार्टनरशिप और मजबूत हो रही है – ऊर्जा व्यापार, डिफेंस कोऑपरेशन बढ़ रहा है। चीन के लिए यह अमेरिका को कमजोर करने और वैश्विक नेतृत्व में अपनी भूमिका बढ़ाने का सुनहरा मौका है।
अमेरिका फंस गया संकट में: संसाधन खिंचे, लक्ष्य अधूरे
अमेरिका इस युद्ध में पूरी तरह उलझ गया है। ट्रंप ने ‘रिजीम चेंज’ का नारा दिया, लेकिन ईरान नहीं टूटा। हवाई अभियान महंगा पड़ रहा है – B-2, B-1 बॉम्बर्स की मेंटेनेंस बढ़ गई, कैरियर्स और डेस्ट्रॉयर्स का बड़ा हिस्सा यहां लगा है। अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह चीन के खिलाफ तैयारियों को प्रभावित कर रहा है।
ट्रंप ने बातचीत की पेशकश की, लेकिन ईरान ने ठुकरा दी। अमेरिकी सैनिकों के घायल होने और क्षेत्रीय हमलों से घरेलू दबाव बढ़ रहा है। युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला रहा है – तेल कीमतें, शिपिंग प्रभावित। अमेरिका अब ‘जीत’ और ‘डिप्लोमेसी’ के बीच फंसा दिख रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह 2003 के इराक युद्ध जैसी जटिलता की ओर बढ़ रहा है।
ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध न केवल मध्य पूर्व को अस्थिर कर रहा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी बदल रहा है। रूस-चीन अमेरिका की एकाग्रता भंग करने का फायदा उठा रहे हैं, जबकि चीन को रणनीतिक और कूटनीतिक लाभ मिल रहा है। अमेरिका के लिए यह संकट का समय है – संसाधन खिंचे हुए हैं और कोई स्पष्ट ‘एग्जिट’ नजर नहीं आ रहा। यदि युद्ध लंबा खिंचा तो क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी और चीन जैसे देशों की वैश्विक भूमिका और मजबूत होगी। दुनिया अब शांति वार्ता की ओर देख रही है, लेकिन दोनों पक्ष अभी भी हथियार नहीं रख रहे।

