नई दिल्ली/देहरादून:B P SINGH/- दक्षिण भारतीय राज्यों में जन्म दर और कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) में तेज गिरावट के कारण राज्य सरकारें चिंतित हो गई हैं। आंध्र प्रदेश सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि तीसरे और चौथे बच्चे के जन्म पर परिवारों को नकद प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। यह कदम दक्षिण भारत में जनसंख्या संकट को रोकने का प्रयास माना जा रहा है।
दक्षिण भारत की चिंताजनक स्थिति
दक्षिण के प्रमुख राज्य — आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना — में TFR 1.4 से 1.7 के बीच पहुंच चुका है, जो प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) 2.1 से काफी नीचे है।
- इन राज्यों में उच्च शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, शहरीकरण और छोटे परिवार की अवधारणा ने जन्म दर को बहुत कम कर दिया है।
- निरंतर सरकारी प्रयासों के बावजूद जन्म दर बढ़ाने में सफलता नहीं मिल पा रही है।
- परिणामस्वरूप इन राज्यों में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि युवा कार्यबल घट रहा है। इससे भविष्य में श्रम शक्ति की कमी, पेंशन और स्वास्थ्य व्यय का बोझ बढ़ने तथा आर्थिक विकास प्रभावित होने की आशंका है।
उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत
भारत में जनसांख्यिकीय असमानता स्पष्ट दिख रही है:
- दक्षिण के राज्य: TFR 1.4-1.7
- बिहार: TFR लगभग 3.0 (सबसे ऊंचा)
- उत्तर प्रदेश: TFR लगभग 2.4
- राजस्थान, मध्य प्रदेश: 2.0-2.3
उत्तराखंड में पहाड़ी आबादी की गिरती जन्म दर
उत्तराखंड में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। राज्य का कुल TFR NFHS-5 (2019-21) के अनुसार 1.9 है, जो प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। Sample Registration System (SRS) 2023 के अनुसार यह और गिरकर 1.7 के आसपास पहुंच गया है।
पहाड़ी क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर:
- गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के अधिकांश पहाड़ी जिलों (पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, टिहरी आदि) में TFR और भी कम है।
- 2001-2011 की जनगणना में अल्मोड़ा और पौड़ी गढ़वाल जिलों में नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई (अल्मोड़ा -1.73%, पौड़ी गढ़वाल -1.51%)।
- राज्य के कुल 16,793 गांवों में से 1,048 गांव पूरी तरह निर्जन (Ghost Villages) हो चुके हैं, जबकि सैकड़ों गांवों की आबादी 10 से भी कम रह गई है।
- पहाड़ी जिलों (9 जिलों) की जनसंख्या वृद्धि दर मात्र 0.70% रही, जबकि मैदानी जिलों (देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर आदि) में यह 2.82% रही।
- पहाड़ी क्षेत्रों में युवा आबादी का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है, जिससे गांव खाली हो रहे हैं, खेती-बाड़ी छूट रही है और स्थानीय संस्कृति-परंपराएं खतरे में पड़ रही हैं।
मुख्य कारण:
- युवाओं का बड़े पैमाने पर पलायन (रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में)।
- देर से विवाह, उच्च शिक्षा और करियर फोकस।
- बच्चों की परवरिश की बढ़ती लागत।
- कृषि की अनुपजाऊ स्थिति और स्थानीय रोजगार की कमी।
इससे देशी पहाड़ी आबादी में गिरावट एक गंभीर जनसांख्यिकीय मुद्दा बन गया है।
हिमाचल प्रदेश की तुलना
हिमाचल प्रदेश में TFR 1.38-1.6 के आसपास पहुंच गया है। जन्म दर 20.5 प्रति हजार से घटकर 12 प्रति हजार से नीचे आ गई है। स्कूलों में छात्र संख्या 2002 के 9.71 लाख से घटकर अब 4.29 लाख रह गई है।
विशेषज्ञों की राय
जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नकद प्रोत्साहन से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, स्थानीय रोजगार के अवसरों, पलायन रोकथाम और महिलाओं के अनुकूल कार्य वातावरण की।
भारत को एक संतुलित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की आवश्यकता है, जो क्षेत्रीय असमानताओं को ध्यान में रखे। यदि दक्षिण और पहाड़ी राज्य बुजुर्ग आबादी के बोझ से जूझते रहे, जबकि उत्तर के राज्य युवा आबादी से भरे रहे, तो संसद में प्रतिनिधित्व, संसाधनों के बंटवारे और राष्ट्रीय विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
निष्कर्ष:
आंध्र प्रदेश की यह नई योजना अन्य राज्यों के लिए भी सोचने का विषय है। उत्तराखंड सरकार को पहाड़ी आबादी को बचाने के लिए विशेष पैकेज, पलायन रोकथाम योजनाओं, स्थानीय रोजगार सृजन और परिवार प्रोत्साहन कार्यक्रमों पर और अधिक ध्यान देने की जरूरत है। जनसंख्या संतुलन भारत के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

