नई दिल्ली, 31 मार्च 2026 – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेज रफ्तार से बढ़ती मांग के साथ दुनिया भर में डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार हो रहा है। लेकिन एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि ये विशाल डेटा सेंटर्स अपने आसपास के इलाकों में ‘हीट आइलैंड’ (गर्मी के द्वीप) बना रहे हैं। इनके कारण स्थानीय सतही तापमान औसतन 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है, जबकि कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी 9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रही है।
यह गर्मी 10 किलोमीटर तक के दायरे में फैल रही है और दुनिया भर में 34 करोड़ से अधिक लोगों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। भारत में मुंबई, चेन्नई और हैदराबाद जैसे प्रमुख एआई डेटा सेंटर हब्स भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। अध्ययन में पाया गया कि मेक्सिको के बाजियो क्षेत्र और स्पेन के अरागॉन प्रांत में भी पिछले 20 वर्षों में बिना किसी अन्य कारण के तापमान में करीब 2 डिग्री सेल्सियस की असामान्य बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो डेटा सेंटर्स के विस्तार से जुड़ी है।
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पिछले 20 वर्षों के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने 8400 से अधिक एआई डेटा सेंटर्स की लोकेशन को मैप करके तापमान परिवर्तनों का अध्ययन किया। उन्होंने मौसमी प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग और अन्य कारकों को अलग करके देखा कि डेटा सेंटर शुरू होने के बाद आसपास के इलाकों में तापमान कैसे बढ़ता है।
डेटा सेंटर्स कैसे बढ़ा रहे हैं तापमान?
एक सामान्य एआई डेटा सेंटर 93,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में फैला हो सकता है और इसमें हजारों सर्वर लगे होते हैं। ये सर्वर लगातार चलते रहते हैं, भारी मात्रा में बिजली की खपत करते हैं और गर्मी निकालते हैं। कूलिंग सिस्टम भी पानी की भारी खपत करते हैं। नतीजतन, आसपास की जमीन गर्म हो जाती है और यह गर्मी हवा में फैलकर बड़े क्षेत्र को प्रभावित करती है।
शोध के अनुसार:
- डेटा सेंटर शुरू होने के बाद आसपास के इलाकों में सतही तापमान में औसतन 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है।
- चरम मामलों में यह बढ़ोतरी 9.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाती है। यह दिल्ली में सर्दियों की सुबह और मई की दोपहर के बीच का तापमान अंतर जितना है।
- प्रभाव 10 किलोमीटर तक फैलता है – उदाहरण के लिए, दिल्ली के कनॉट प्लेस से नोएडा सेक्टर-18 की दूरी के बराबर।
- 7 किलोमीटर दूर तक गर्मी की तीव्रता में केवल 30% की कमी आती है, यानी असर काफी दूर तक रहता है।
भारत, स्पेन और मेक्सिको में स्थिति
भारत में एआई और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा दांव लगाया जा रहा है। मुंबई, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहर एआई डेटा सेंटर्स के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। इन इलाकों में रहने वाले लाखों लोग अब बढ़ते स्थानीय तापमान का सामना कर रहे हैं, जो गर्मियों में और भी गंभीर हो जाता है। भारत जैसे गर्म देश में यह अतिरिक्त गर्मी स्वास्थ्य, कृषि और ऊर्जा खपत पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है।
मेक्सिको के बाजियो क्षेत्र में पिछले 20 वर्षों में तापमान में करीब 2 डिग्री सेल्सियस की असामान्य बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो आसपास के अन्य क्षेत्रों में नहीं देखी गई। इसी तरह स्पेन के अरागॉन प्रांत, जो यूरोप का प्रमुख हाइपरस्केल एआई डेटा सेंटर हॉटस्पॉट है, में भी यही पैटर्न देखा गया। दोनों जगहों पर पड़ोसी प्रांतों में ऐसा बदलाव नहीं हुआ, जो साफ तौर पर डेटा सेंटर्स से जुड़ा है।
वैश्विक स्तर पर 34 करोड़ से अधिक लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां डेटा सेंटर्स के कारण तापमान बढ़ा है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि डेटा सेंटर्स के और विस्तार से यह संख्या और बढ़ सकती है।
एआई की छिपी पर्यावरणीय कीमत
एआई टूल्स जैसे ChatGPT, Claude, Grok आदि की लोकप्रियता के साथ डेटा सेंटर्स की संख्या और उनकी क्षमता तेजी से बढ़ रही है। ये सेंटर्स भारी बिजली और पानी की खपत करते हैं। एक ओर जहां एआई मानवता के लिए प्रगति ला रहा है, वहीं दूसरी ओर यह पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर बोझ बढ़ा रहा है।
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की लीड रिसर्चर एंड्रिया मेरिनोनी ने कहा, “डेटा सेंटर्स के नियोजित विस्तार से समाज पर पर्यावरण, लोगों की भलाई और अर्थव्यवस्था के मामले में नाटकीय प्रभाव पड़ सकता है। अभी भी समय है कि हम एआई की मांग को प्रभावित किए बिना एक अलग रास्ता अपनाने पर विचार करें, ताकि मानवता की प्रगति बनी रहे।”
सस्टेनेबिलिटी एक्सपर्ट डेबोरा एंड्र्यूज ने चेतावनी दी, “एआई-गोल्ड की होड़ अच्छी प्रैक्टिस और सिस्टमैटिक सोच को ओवरराइड कर रही है। यह विकास किसी भी व्यापक, अधिक सस्टेनेबल सिस्टम से कहीं ज्यादा तेजी से हो रहा है।”
क्या हैं प्रभाव?
- स्वास्थ्य पर असर: बढ़ा हुआ तापमान हीट स्ट्रोक, श्वसन समस्याएं और अन्य स्वास्थ्य मुद्दों को बढ़ावा दे सकता है, खासकर गर्म देशों में।
- कृषि और पानी: अतिरिक्त गर्मी फसलों पर असर डाल सकती है और पानी की मांग बढ़ा सकती है।
- ऊर्जा खपत: कूलिंग के लिए और ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ेगी, जो क्लाइमेट चेंज को और तेज कर सकती है।
- आर्थिक प्रभाव: स्थानीय समुदायों को रहने, काम करने और रोजमर्रा की जिंदगी में मुश्किलें बढ़ेंगी।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि कुछ तापमान बढ़ोतरी के आंकड़े काफी ऊंचे दिख रहे हैं, इसलिए और अधिक पीयर-रिव्यूड स्टडीज की जरूरत है।
भविष्य के लिए क्या करें?
एआई का विकास रुक नहीं सकता, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के उपाय किए जा सकते हैं:
- डेटा सेंटर्स को ठंडे क्षेत्रों में स्थापित करना।
- एडवांस्ड कूलिंग टेक्नोलॉजी जैसे इमर्सन कूलिंग या वेस्ट हीट रिसाइक्लिंग का इस्तेमाल।
- रिन्यूएबल एनर्जी पर ज्यादा निर्भरता।
- भारत जैसे देशों में सख्त पर्यावरण मानकों और लोकल इंपैक्ट असेसमेंट की अनिवार्यता।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के सस्टेनेबल मॉडल विकसित करना।
भारत, जो एआई में तेजी से निवेश कर रहा है, को इस मुद्दे पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। मुंबई, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में नए डेटा सेंटर्स लगाते समय स्थानीय तापमान प्रभाव का आकलन अनिवार्य होना चाहिए।
आगे क्या
एआई डेटा सेंटर्स की गर्मी अब सिर्फ सर्वर रूम तक सीमित नहीं रही। यह 10 किलोमीटर तक फैलकर लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है। 9 डिग्री तक की बढ़ोतरी और 34 करोड़ प्रभावित लोगों का आंकड़ा चेतावनी दे रहा है कि टेक्नोलॉजी की प्रगति की कीमत पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के रूप में न चुकानी पड़े।
शोधकर्ताओं का संदेश साफ है – अभी भी समय है कि हम एआई को सस्टेनेबल तरीके से विकसित करें। बिना सोचे-समझे विस्तार से पहले पर्यावरणीय लागत को समझना और कम करना जरूरी है। अन्यथा, एआई की चमक के पीछे गर्म होती दुनिया और गर्म होती जिंदगियां एक बड़ी समस्या बन सकती हैं।
नागरिकों, सरकारों और टेक कंपनियों को अब एआई के इस छिपे प्रभाव को गंभीरता से लेना होगा। स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर प्लानिंग और जिम्मेदार विकास ही इस चुनौती का समाधान हो सकता है।
(यह विस्तृत समाचार रिपोर्ट वैज्ञानिक अध्ययन के निष्कर्षों, विशेषज्ञ बयानों और वैश्विक आंकड़ों पर आधारित है। बढ़ते तापमान के प्रभाव को कम करने के लिए समय पर कदम उठाना सभी के लिए जरूरी है।)

