कवीन्द्र सिंह–पिथौरागढ़, 14 नवंबर 2025 (समाचार रिपोर्ट):
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के धारचूला तहसील में स्थित जौलजिबी में आज से शुरू हुए ऐतिहासिक जौलजिबी मेले ने एक बार फिर भारत-नेपाल सीमा पर सांस्कृतिक और आर्थिक एकता का प्रतीक बनकर उभरकर सामने आया है। गोरी और काली नदियों के संगम पर आयोजित इस 13 दिवसीय मेले का उद्घाटन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया। उन्होंने मेले को “राज्य का अमूल्य धरोहर” बताते हुए कहा कि यह सदियों से भारत, नेपाल, तिब्बत और सीमांत क्षेत्रों के बीच आपसी सद्भाव को मजबूत करता रहा है। इस वर्ष मेले में 300 से अधिक दुकानों का आवंटन किया गया है, जहां ऊनी वस्त्र, नमक, बोरैक्स, शहद, घी, हिंग, शिलाजीत जैसी वस्तुओं का व्यापार होगा। नेपाली व्यापारियों की भारी संख्या के साथ-साथ स्थानीय महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों द्वारा निर्मित उत्पादों का भी प्रदर्शन हो रहा है।
मुख्यमंत्री ने उद्घाटन अवसर पर 64.47 करोड़ रुपये की 18 योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण भी किया, जिसमें 29.65 करोड़ की 13 योजनाओं का उद्घाटन और 34.72 करोड़ की पांच योजनाओं का शिलान्यास शामिल है। उन्होंने कहा कि यह मेला न केवल व्यापार का केंद्र है, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देने और सीमांत अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम भी है। हालांकि, पहले दिन दुकानों की संख्या सीमित रही, लेकिन वृष्चिक संक्रांति (16 नवंबर) के बाद भीड़ बढ़ने की उम्मीद है। स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए हैं, जिसमें नेपाल सीमा पर फुट ओवर ब्रिज के माध्यम से आवागमन सुगम बनाया गया है।
यह मेला कुमाऊंनी उत्सव के रूप में भी जाना जाता है, जहां संगीत, नृत्य और लोक भोज का आयोजन होता है। पिछले वर्ष 2024 में भी इसी तरह का आयोजन हुआ था, जहां मुख्यमंत्री ने सांस्कृतिक एकता पर जोर दिया था। 2025 में कोविड के बाद की रिकवरी के बीच यह मेला सीमांत क्षेत्रों के लिए आर्थिक राहत साबित हो रहा है। मेला 26 नवंबर तक चलेगा, और पर्यटकों को दिल्ली-धारचूला राजमार्ग से आसानी से पहुंचने की सुविधा है।

जौलजिबी मेले का इतिहास
जौलजिबी मेला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का एक प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक आयोजन है, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं। यह गोरी और काली नदियों के संगम पर आयोजित होता है, जो धारचूला से मात्र 10 किलोमीटर दूर है। मूल रूप से यह धार्मिक मेला था, जो काली नदी के तट पर ज्वालेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ा हुआ था। 1871 में अस्कोट के राजा पुष्कर पाल ने ज्वालेश्वर महादेव की प्रतिमा का जीवंतिकरण कर इस मेले की शुरुआत की। शुरू में यह मार्गशीर्ष संक्रांति पर दो दिनों तक आयोजित होता था, लेकिन धीरे-धीरे व्यापारिक महत्व बढ़ने से यह एक प्रमुख बाजार बन गया।
1914 में अस्कोट के जमींदार ने इसे कार्तिक पूर्णिमा पर स्थानांतरित कर सात दिनों का व्यावसायिक मेला बना दिया। यह मेला तिब्बत, नेपाल और उत्तर भारत के व्यापारियों का प्रमुख केंद्र था, जहां ऊनी वस्त्र, हिमालयी घोड़े, मृग मिश्री, आयुर्वेदिक दवाएं, शहद, घी, हिंग और शिलाजीत का आदान-प्रदान होता था। दिल्ली, लखनऊ और तराई क्षेत्रों से व्यापारी आते थे। 1948 में अस्कोट रियासत के भारत में विलय के बाद मेला कुछ वर्षों के लिए बंद हो गया, लेकिन 1956 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे पुनर्जीवित किया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बती व्यापार बंद हो गया, लेकिन नेपाली और भारतीय व्यापार जारी रहा। आज यह 14 से 26 नवंबर तक 13 दिनों का मेला है, जो कुमाऊं के सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है। इस मेले ने विश्व युद्धों के दौरान स्थानीय युवाओं की सेना भर्ती में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अस्कोट कत्यूरी पालों के राजदरबार की भूमिका
अस्कोट कत्यूरी पाल वंश का राजदरबार जौलजिबी मेले का प्रारंभिक संरक्षक और आयोजक रहा है। कत्यूरी राजवंश, जो 7वीं से 11वीं शताब्दी तक कुमाऊं का प्रमुख शासक वंश था, 1279 ईस्वी में अभय पाल देव (कत्यूरी राजा ब्रह्म देव के पौत्र) द्वारा अस्कोट में राजबार शाखा के रूप में स्थापित हुआ। । पाल वंश ने कुमाऊं की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को मजबूत किया, जिसमें मंदिर निर्माण और लोक उत्सव प्रमुख थे।
1871 में राजा पुष्कर पाल ने जौलजिबी के मैदान को मेला स्थल के रूप में दान किया और ज्वालेश्वर महादेव मंदिर का पुनरुद्धार कर धार्मिक मेले की नींव रखी। इसके बाद तिब्बती और नेपाली व्यापारियों का आगमन बढ़ा, जो स्थानीय किसानों के अनाज से वस्तुओं का आदान-प्रदान करने लगे। 1914 में अस्कोट के शासक ने मेले को कार्तिक पूर्णिमा पर स्थानांतरित कर व्यावसायिक स्वरूप दिया, जिससे यह उत्तर भारत का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया। राजदरबार ने 1948 तक मेले का वार्षिक आयोजन किया, जिसमें पाल परिवार ने भूमि, सुरक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों का प्रबंधन किया। इस वंश की भूमिका ने मेले को न केवल आर्थिक महत्व दिया, बल्कि कुमाऊं की सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत किया। आज भी अस्कोट के पाल वंश के वंशज स्थानीय इतिहास के संरक्षक के रूप में जाने जाते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जौलजिबी मेले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कुमाऊं के मध्यकालीन व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़ी है। कत्यूरी काल (संभवतः 300-1947 ईस्वी) से ही यह क्षेत्र तिब्बत-तराई व्यापार मार्ग का हिस्सा था, जहां ऊनी उत्पादों और हिमालयी वस्तुओं का लेन-देन होता था। 13वीं शताब्दी में अस्कोट राजबार वंश की स्थापना के बाद यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से मजबूत हुआ। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश काल में भी यह कैलाश-मानसरोवर यात्रा मार्ग का महत्वपूर्ण पड़ाव था।
मेला शुरू में पशु व्यापार का केंद्र था, लेकिन धीरे-धीरे यह बहु-राष्ट्रीय बाजार बन गया। विश्व युद्धों में सेना भर्ती का केंद्र होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। 1962 के युद्ध के बाद तिब्बती व्यापार बंद होने पर भी नेपाली प्रभाव बरकरार रहा। आज यह उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रायोजित सांस्कृतिक धरोहर है, जो वैश्वीकरण के दौर में भी अपनी प्राचीनता को संजोए रखा है। यह मेला न केवल व्यापार, बल्कि लोकगीतों, नृत्यों और सामाजिक एकता का प्रतीक है, जो देवभूमि उत्तराखंड की विविधता को दर्शाता है।

