देहरादून, 31 मार्च 2026 by B P Singh– उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। आज कुमाऊं क्षेत्र में एक टाइगर के हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई। यह घटना पिछले कुछ दिनों में टाइगर अटैक्स की श्रृंखला को और बढ़ाती है। वन विभाग के अधिकारियों ने पुष्टि की कि पीड़ित जंगल के किनारे फसल या चारा इकट्ठा करने गए थे, जहां टाइगर ने उन पर हमला कर दिया। स्थानीय लोगों में भय और गुस्सा फैल गया है।
पिछले एक महीने (मार्च 2026) में टाइगर, तेंदुआ (लेपर्ड), भालू और हाथी के हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। राज्य भर में कई गांवों में दहशत का माहौल है। महिलाएं, बच्चे और किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। वन मंत्री सुबोध उनियाल और वन विभाग के उच्च अधिकारियों पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने संघर्ष को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। जनता का कहना है कि वन प्रशासन का पूर्ण पतन हो चुका है – न पर्याप्त पेट्रोलिंग, न क्विक रिस्पॉन्स टीम्स की प्रभावी तैनाती, न जागरूकता कार्यक्रम, और न ही प्रभावी मैन-ईटर घोषित करने की प्रक्रिया।
आज की घटना: टाइगर अटैक में मौत
आज उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र (संभवतः नैनीताल या ऊधम सिंह नगर जिले के जंगल क्षेत्र) में एक व्यक्ति टाइगर के हमले का शिकार हो गया। पीड़ित के शव को जंगल से कुछ दूरी पर बरामद किया गया। वन अधिकारी मौके पर पहुंचे और पोस्टमार्टम के लिए शव भेजा गया। स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की। यह घटना पिछले 13-15 दिनों में टाइगर के दूसरे हमले की याद दिलाती है, जब फरवरी के अंत में भी महिलाओं पर हमले हुए थे।
पिछले एक महीने में वन्यजीव हमलों के प्रमुख मामले
पिछले 30 दिनों में उत्तराखंड में टाइगर, तेंदुआ, भालू और हाथी के हमलों की कई घटनाएं दर्ज की गईं। कुछ प्रमुख घटनाएं निम्न हैं:
- टाइगर अटैक्स: कई जिलों में टाइगर ने महिलाओं और किसानों पर हमले किए। फरवरी के अंत और मार्च में हल्द्वानी के फतेहपुर फॉरेस्ट रेंज में दो महिलाओं (कमला फर्त्याल और गंगा देवी) की मौत हुई। रुद्रप्रयाग में एक बच्चे (दक्ष बिष्ट) की मौत तेंदुए के हमले में हुई, हालांकि कुछ मामलों में टाइगर भी संदिग्ध थे। ऊधम सिंह नगर में 73 वर्षीय किसान की मौत टाइगर अटैक में हुई। जनवरी-मार्च की अवधि में कुमाऊं में टाइगर अटैक्स से मौतों की संख्या 10 तक पहुंच गई।
- तेंदुआ (लेपर्ड) अटैक्स: तेंदुए के हमले सबसे ज्यादा रहे। पौड़ी गढ़वाल, नैनीताल और अन्य क्षेत्रों में महिलाएं और बच्चे शिकार बने। एक महीने में कई चोटिल मामले सामने आए। तेंदुए अक्सर गांवों में घुसकर हमला करते हैं।
- भालू अटैक्स: हिमालयन ब्लैक बियर के हमले बढ़े। जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों में हाइबरनेशन प्रभावित होने से भालू गांवों और खेतों में घुस रहे हैं। कई चोटिल और कुछ मौतें दर्ज हुईं।
- हाथी अटैक्स: तराई क्षेत्रों में हाथियों के झुंड फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं और कभी-कभी लोगों पर हमला भी कर रहे हैं।
इन हमलों में महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं क्योंकि वे चारा, लकड़ी या फसल इकट्ठा करने जंगलों के किनारे जाती हैं। बच्चे स्कूल जाते समय या घर के आसपास खेलते समय खतरे में हैं। कई गांवों में स्कूल बंद करने पड़े।
वन मंत्री और अधिकारियों की विफलता: प्रशासनिक ढांचे का पूर्ण पतन
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से है, लेकिन पिछले एक साल में यह और बिगड़ा है। 2025 में ही सैकड़ों मौतें और हजारों चोटें दर्ज हुईं। राज्य बनने के बाद से अब तक 1,296 से अधिक मौतें और 6,624 से ज्यादा चोटें वन्यजीव हमलों में हुई हैं।
वन मंत्री सुबोध उनियाल पर विपक्ष और स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने समस्या को गंभीरता से नहीं लिया। सोलर लाइट्स बांटने, क्विक रिस्पॉन्स टीम्स बनाने और स्टडी कराने जैसे घोषणात्मक कदम उठाए गए, लेकिन जमीन पर अमल नहीं हुआ। पौड़ी जैसे जिलों में डीएफओ को हटाया गया, लेकिन समस्या बनी रही।
विफलताएं:
- पेट्रोलिंग और निगरानी की कमी: जंगलों में पर्याप्त स्टाफ और कैमरा ट्रैप्स नहीं। युवा टाइगर और तेंदुए मानव बस्तियों के करीब आ रहे हैं, लेकिन पूर्व चेतावनी प्रणाली अनुपस्थित।
- मैन-ईटर घोषणा में देरी: हमलावर जानवरों को तुरंत मैन-ईटर घोषित नहीं किया जाता, जिससे और जानें जाती हैं।
- जागरूकता और सुरक्षा उपायों का अभाव: गांवों में सोलर फेंसिंग, ट्रेंच या एस्कॉर्ट सिस्टम नहीं। स्कूल बच्चों को एस्कॉर्ट देने की घोषणा सिर्फ कागजों तक सीमित।
- जलवायु परिवर्तन को नजरअंदाज: कम बर्फबारी और गर्मी से भालू हाइबरनेशन नहीं कर पाते और भोजन की तलाश में गांवों में घुसते हैं। विभाग ने ठोस अध्ययन या अनुकूलन योजना नहीं बनाई।
- क्षतिपूर्ति में देरी: मौत पर 10 लाख रुपये की घोषणा है, लेकिन पीड़ित परिवारों को समय पर नहीं मिलता।
- समन्वय की कमी: वन विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस के बीच तालमेल नहीं।
जनता का कहना है कि वन प्रशासन पूरी तरह चरमरा चुका है। गांव खाली हो रहे हैं, लोग पलायन कर रहे हैं। विपक्षी नेता गणेश गोदियाल जैसे नेताओं ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कई बार निर्देश दिए, लेकिन स्थिति नहीं सुधरी।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की राय
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि टाइगर रिजर्व से बाहर युवा टाइगर निकल रहे हैं क्योंकि जंगल का दबाव बढ़ रहा है। तेंदुए और भालू मानव बस्तियों के करीब आ रहे हैं। हाथी कॉरिडोर ब्लॉक हो रहे हैं।
स्थानीय लोग पूछ रहे हैं – “कब तक हम जंगलों के पास रहकर डरते रहेंगे? सरकार सिर्फ घोषणाएं करती है, लेकिन सुरक्षा नहीं देती।”
समाधान के सुझाव और जरूरी कदम
- तत्काल प्रभावी क्विक रिस्पॉन्स टीम्स को मजबूत करें और ट्रेनिंग दें।
- जंगलों के किनारे सोलर फेंसिंग, ट्रेंच और अलार्म सिस्टम लगाएं।
- प्रभावित क्षेत्रों में नियमित पेट्रोलिंग और कैमरा ट्रैप्स बढ़ाएं।
- मैन-ईटर जानवरों को तुरंत ट्रैक और ट्रांसलोकेट या एलिमिनेट करें।
- जलवायु अनुकूलन योजना बनाएं और जागरूकता अभियान चलाएं।
- पीड़ित परिवारों को तुरंत मुआवजा और पुनर्वास दें।
- वन मंत्री स्तर पर समीक्षा बैठकें नियमित करें और जवाबदेही तय करें।
उत्तराखंड में वन्यजीव हमले अब महामारी का रूप ले चुके हैं। आज की टाइगर अटैक में मौत इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करती है। वन मंत्री सुबोध उनियाल और वन विभाग के अधिकारियों की लगातार विफलता और प्रशासनिक ढांचे का पूर्ण पतन जनता के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। अगर तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो और जानें जाएंगी और गांव खाली होते रहेंगे।
सरकार को अब सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि प्रभावी कार्रवाई करनी होगी। जनता की सुरक्षा सर्वोपरि है – वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ मानव जीवन की रक्षा भी जरूरी है।
