नैनीताल हाईकोर्ट ने आईआईटी खड़गपुर से पीएचडी कर चुके वैक्सीन वैज्ञानिक डॉ. आकाश यादव को बड़ी राहत दी है। पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा के क्रियान्वयन को हाईकोर्ट ने अपील लंबित रहने तक स्थगित कर दिया है।
कोर्ट ने वैज्ञानिक के तर्कों को माना वैध
डॉ. यादव की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि वह भारतीय इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड, हैदराबाद में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं और पिछले तीन वर्षों से वैक्सीन अनुसंधान में सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि सजा के कारण वे अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाएंगे, जिससे जन स्वास्थ्य और राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकता है। कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए सजा पर रोक का आदेश दिया।
क्या है मामला
यह मामला वर्ष 2015 का है, जब आरोपी की पत्नी, जो पंतनगर विश्वविद्यालय में सेवारत थीं, ने आत्महत्या कर ली थी। उस समय डॉ. यादव हैदराबाद में थे। हालांकि, मृतका द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट में पति को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाया था फैसला
रुद्रपुर की ट्रायल कोर्ट ने डॉ. आकाश यादव को दहेज हत्या और अन्य गंभीर धाराओं से बरी कर दिया था, लेकिन पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी माना था और सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने पहले दी थी जमानत
हाईकोर्ट पहले ही वैज्ञानिक को जमानत दे चुकी थी और अब दोषसिद्धि के स्थगन की मांग पर सुनवाई करते हुए सजा के निष्पादन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने विभिन्न कानूनी दृष्टांतों का हवाला देते हुए आदेश पारित किया कि अपील का अंतिम निपटारा होने तक सजा प्रभावी नहीं रहेगी।