उत्तराखंड: खेतर कन्याल में प्रधान की कुर्सी खाली रहेगी… क्योंकि वन रावत आदिम जाति की कोई महिला 8वीं पास नहीं

उत्तराखंड: खेतर कन्याल में प्रधान की कुर्सी खाली रहेगी… क्योंकि वन रावत आदिम जाति की कोई महिला 8वीं पास नहीं

पिथौरागढ़ | 22 नवंबर 2025 – लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत में भी लोकतंत्र शर्मसार हो गया है। पिथौरागढ़ जिले की खेतार कन्याल ग्राम सभा में अनुसूचित जनजाति (महिला) के लिए आरक्षित ग्राम प्रधान का पद खाली रहने वाला है। वजह? वन रावत (आदिम जनजाति) की एक भी महिला न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता यानी कक्षा 8 पास नहीं है।

स्वतंत्र भारत में 75 साल, संविधान लागू होने के 75 साल, अनुसूचित जनजाति को आरक्षण के 75 साल… फिर भी एक पूरा समुदाय आज भी प्राथमिक शिक्षा से वंचित है।
प्रश्न सीधा है – ये 75 साल का आरक्षण किस काम का, जो एक आदिवासी महिला को आठवीं तक भी नहीं पढ़ा सका?

खेतार कन्याल में लगभग सभी वन रावत मतदाता हैं । पिछले सात दशकों में केंद्र में कांग्रेस की सरकारें आईं, भाजपा की सरकारें आईं, उत्तराखंड में एनडीए और कांग्रेस दोनों ने शासन किया।
मुख्यमंत्री बदले, विधायक बदले, जिला पंचायत अध्यक्ष बदले, डीएम बदले, जिला शिक्षा अधिकारी बदले, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी बदले…

हजारों करोड़ के शिक्षा बजट आए, आंगनबाड़ी बनीं, प्राथमिक स्कूल बने, राजीव गांधी नवोदय विद्यालय बने, एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल बने, पीवीटीजी के लिए विशेष पैकेज आए, फिर भी वन रावत की बेटियां आज भी कक्षा 5 के बाद स्कूल छोड़ देती हैं।

एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
“हमारे पास रिकॉर्ड है कि पिछले 20 साल में दर्जनों बार शिक्षा अधिकारियों और डीएम ने दौरा किया, फोटो खिंचवाई, योजनाएं घोषित कीं, लेकिन ग्राउंड पर एक भी स्थायी कार्य नहीं हुआ। शिक्षक आते हैं, दो-चार महीने में तबादला ले लेते हैं, एक भी 8 वी पास न होना शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है।”

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता वन रावत कहते हैं,
“आरक्षण तो दे दिया, लेकिन उसके लिए जरूरी शिक्षा नहीं दी। अब जब सीट आरक्षित कर दी, तो योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहा। ये आरक्षण का मजाक नहीं तो और क्या है?”

राज्य निर्वाचन आयोग के नियम साफ हैं – यदि योग्य उम्मीदवार नहीं मिला तो सीट खाली रहेगी। यानी लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का अधिकार भी छिन जाएगा।
प्रशासनिक विफलता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि एक पूरी ग्राम सभा बिना प्रधान के रहेगी, क्योंकि सरकार 75 साल में एक भी महिला को 8वीं पास नहीं करा पाई।

वन रावत समुदाय की महिलाएं आज भी जंगल से लकड़ी लाती हैं, खेत में काम करती हैं, बच्चे पालती हैं, लेकिन उनके बच्चे स्कूल नहीं जाते। दूरदराज के गांव, टूटी सड़कें, बिजली-पानी का अभाव, और सबसे बड़ी बात – प्रशासन की उदासीनता।

खेतार कन्याल की खाली कुर्सी सिर्फ एक ग्राम पंचायत की कुर्सी नहीं, यह 75 साल की सरकारी विफलता का जीता-जागता स्मारक है।

#तो कैसे बनेगी बात
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2024 में sub-classification (आरक्षण के अंदर आरक्षण) को वैध ठहराया था। यदि उत्तराखंड सरकार वन रावत जैसी अति पिछड़ी एवं आदिम जनजातियों (PVTG) के लिए अलग से सब-कोटा बनाती, तो आज ST का पूरा लाभ पहले से संपन्न एवं शिक्षित अनुसूचित जनजातियों के पास ही नहीं चला जाता। सबसे वंचित समुदाय को उसका हक मिलता और शायद आज यह सीट खाली न रहती।
लेकिन सरकारें नींद से जागेंगी या फिर एक और दशक तक सिर्फ फाइलें घुमाती रहेंगी – यह वक्त ही बताएगा।

(रिपोर्ट: Takana Times टीम)

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