वसीयत पर प्रोबेट अब अनिवार्य नहीं संसद ने उत्तराधिकार कानून किया सरल

वसीयत पर प्रोबेट अब अनिवार्य नहीं संसद ने उत्तराधिकार कानून किया सरल
Glimpses of the new Parliament Building, in New Delhi

संसद ने औपनिवेशिक काल के पुराने और भेदभावपूर्ण नियमों से मुक्ति दिलाते हुए बड़ा सुधार किया है। दिसंबर 2025 में दोनों सदनों से पारित रीपीलिंग एंड अमेंडिंग एक्ट, 2025 के तहत इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब वसीयत (विल) के आधार पर संपत्ति हस्तांतरण के लिए प्रोबेट लेना अनिवार्य नहीं रहा।

पहले धारा 213 के तहत हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी समुदायों के लिए मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे पूर्व प्रेसिडेंसी टाउन्स में बनी वसीयत या वहां स्थित अचल संपत्ति के लिए प्रोबेट जरूरी था। यह नियम मुस्लिम और क्रिश्चियन समुदायों पर लागू नहीं होता था, जिसे भेदभावपूर्ण माना जाता था। अब धारा 213 पूरी तरह हटा दी गई है, जिससे पूरे देश में उत्तराधिकार के नियम एकसमान हो गए हैं। धारा 370 में भी संशोधन किया गया है, जिससे बैंक बैलेंस, फिक्स्ड डिपॉजिट, शेयर आदि के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट आसानी से मिल सकेगा।

इस सुधार के फायदे:

  • वसीयत के लाभार्थियों को लंबी अदालती प्रक्रिया से मुक्ति।
  • अनावश्यक मुकदमे कम होंगे, समय और पैसा बचेगा।
  • छोटे-बड़े सभी परिवारों को विरासत प्राप्त करने में आसानी।
  • औपनिवेशिक भेदभाव का अंत और “ईज ऑफ लिविंग” को बढ़ावा।

हालांकि, यदि विवाद की आशंका हो या भविष्य में मजबूत कानूनी सुरक्षा चाहिए, तो प्रोबेट वैकल्पिक रूप से लिया जा सकता है। कानून मंत्री ने इसे डी-कोलोनाइजेशन की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है।

प्रोबेट प्रक्रिया क्या है? विस्तार से समझें

प्रोबेट एक कानूनी प्रक्रिया है जिसमें अदालत वसीयत की वैधता की पुष्टि करती है और एक्जीक्यूटर (निष्पादक) को संपत्ति वितरण का अधिकार देती है। अब यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन समझना जरूरी है:

  1. याचिका दाखिल करना: वसीयत में नामित एक्जीक्यूटर जिला न्यायाधीश या हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करता है। इसमें मृतक की मौत का विवरण, वसीयत की मूल प्रति, संपत्ति का ब्योरा और लाभार्थियों की सूची शामिल होती है।
  2. सत्यापन और गवाही: गवाहों से शपथपत्र और गवाही ली जाती है।
  3. नोटिस जारी: संबंधितों और सार्वजनिक नोटिस (अखबार में) जारी कर आपत्ति मंगवाई जाती है।
  4. आपत्ति का निपटारा: यदि आपत्ति हो तो मुकदमा चलता है; नहीं तो प्रोबेट जल्द मिल जाता है।
  5. प्रोबेट जारी: अदालत मुहर लगी प्रमाणित वसीयत देती है।

समय और खर्च: बिना विवाद के 6-12 महीने, विवाद में वर्षों। खर्च संपत्ति मूल्य पर आधारित कोर्ट फीस + वकील शुल्क।

अब प्रोबेट कब लें? बड़ी संपत्ति, बहु-राज्य मामलों या विवाद की संभावना में यह अभी भी सुरक्षित विकल्प है।

यह बदलाव लाखों परिवारों के लिए विरासत को आसान और निष्पक्ष बनाएगा। किसी विशिष्ट मामले में कानूनी सलाह जरूर लें।

(स्रोत: रिपीलिंग एंड अमेंडिंग एक्ट, 2025 एवं इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925)

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