जिंदगी बच सकती थी, अगर अस्पताल में बेड होता

जिंदगी बच सकती थी, अगर अस्पताल में बेड होता

जिले के सबसे बड़े जिला अस्पताल में इलाज के लिए हालात लगातार चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। मौजूदा स्थिति यह है कि अस्पताल के सभी बेड फुल हो चुके हैं। इलाज के लिए आने वाले मरीजों को भर्ती होने से पहले लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, और कई बार तो गंभीर स्थिति में भी वेटिंग लिस्ट में नाम दर्ज करना पड़ रहा है।

बरामदे तक में लगाए गए हैं बिस्तर

120 बेड की क्षमता वाले इस अस्पताल में इस समय 150 से अधिक मरीज भर्ती हैं। लगातार बढ़ते दबाव को देखते हुए अस्पताल प्रशासन ने बरामदों में तक बिस्तर लगाकर मरीजों का इलाज शुरू किया, लेकिन अब वहां भी जगह नहीं बची है। ऐसे में अस्पताल प्रबंधन ने अब गंभीर मरीजों को ही भर्ती करने की नीति अपनाई है, जबकि अन्य को प्राथमिक उपचार के बाद दवा देकर घर भेजा जा रहा है।

मौसम बना बीमारी की वजह

मौसम परिवर्तन के चलते निमोनिया, टायफायड, सांस की तकलीफ जैसी समस्याओं से पीड़ित मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। रोज़ाना एक हजार से अधिक लोग जिला अस्पताल पहुंच रहे हैं। ओपीडी, पर्ची काउंटर, डॉक्टरों के कक्ष और दवा वितरण केंद्र पर लंबी कतारें आम हो गई हैं।

65 करोड़ की लागत से बना बेस अस्पताल, लेकिन सुविधाएं शून्य

लिन्ठ्यूड़ा में सीमांत क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के उद्देश्य से लगभग 65 करोड़ रुपये की लागत से बेस अस्पताल का निर्माण किया गया। लेकिन दो साल बाद भी वहां न विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, न प्रयोगशाला, न ही जरूरी संसाधन। नतीजतन, आज तक इस अस्पताल में एक भी मरीज भर्ती नहीं किया जा सका है।

प्रशासन की प्रतिक्रिया

जिला अस्पताल की पीएमएस डॉ. भागीरथी गर्ब्याल ने कहा,

“बरसात के मौसम में बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। मरीजों की संख्या अत्यधिक हो चुकी है। हर मरीज को बेहतर इलाज देने की कोशिश की जा रही है। गंभीर रोगियों को भर्ती करने को प्राथमिकता दी जा रही है और हम क्षमता से अधिक बिस्तर लगाकर इलाज कर रहे हैं।”

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