उत्तराखंड में वन विभाग की चरम लापरवाही: गुलदार का आतंक जारी, घास काटते समय महिला पर हमला – पिछले एक सप्ताह में कई जानलेवा घटनाएं, पहाड़ी जनता की जान पर बन रही है सियासत

उत्तराखंड में वन विभाग की चरम लापरवाही: गुलदार का आतंक जारी, घास काटते समय महिला पर हमला – पिछले एक सप्ताह में कई जानलेवा घटनाएं, पहाड़ी जनता की जान पर बन रही है सियासत

पौड़ी/नैनीताल/देहरादून, 23 अप्रैल 2026 – उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वन विभाग की नाकामी एक बार फिर सामने आ गई है। हाल ही में उत्तराखंड मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, एक महिला घास काटते समय गुलदार (तेंदुआ) के हमले का शिकार बन गई। महिला जंगल में घास काट रही थी, तभी अचानक गुलदार ने उन पर हमला कर दिया। हमले में महिला गंभीर रूप से घायल हुईं और इलाके में दहशत फैल गई। यह घटना पहाड़ी महिलाओं की मजबूरी को उजागर करती है, जो रोजाना चारा, ईंधन और जलाऊ लकड़ी जुटाने जंगलों में जाती हैं और जान जोखिम में डालती हैं।

वन विभाग की ओर से त्वरित कार्रवाई की बजाय केवल आश्वासन दिए जा रहे हैं। स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हैं कि वन विभाग ने खतरे वाले क्षेत्रों में पर्याप्त गश्त, ट्रैप कैमरे या समस्या वाले जानवरों को पकड़ने की प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं लिया। परिणामस्वरूप, मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता जा रहा है और निर्दोष पहाड़ी निवासी रोजाना मौत और चोट के शिकार हो रहे हैं।

पिछले एक सप्ताह की प्रमुख घटनाएं

पिछले सात दिनों में उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों की कई घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं, हालांकि विस्तृत आंकड़े अभी आ रहे हैं। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मार्च 2026 तक ही 118 हमले दर्ज हुए, जिनमें 20 लोगों की मौत और 98 घायल हुए। रामनगर और नैनीताल वन प्रभाग इस संकट के केंद्र बने हुए हैं।

  • घास काटते समय महिला पर गुलदार हमला (हालिया घटना): महिला जंगल में घास काट रही थीं। गुलदार ने अचानक हमला कर उन्हें घायल कर दिया। इलाके में भय का माहौल है। वन विभाग की टीम पहुंची, लेकिन देरी से लोगों में आक्रोश बढ़ा। परिवार का आरोप है कि पहले भी कई बार शिकायत की गई थी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
  • नैनीताल और रामनगर क्षेत्र में लगातार दहशत: इन प्रभागों में तेंदुओं और हाथियों के हमले बढ़े हैं। पिछले सप्ताह में कई महिलाओं और बच्चों पर हमले की सूचनाएं आईं, जिनमें चोटिल होने की घटनाएं शामिल हैं। एक मामले में महिला चारा इकट्ठा करते समय घायल हुई।
  • पौड़ी गढ़वाल में जारी खतरा: पौड़ी पहले से ही उच्च संघर्ष वाले क्षेत्रों में शामिल है। अप्रैल की शुरुआत में 4 वर्षीय बालिका दृष्टि रावत की तेंदुए के हमले में मौत हो चुकी थी। पिछले सप्ताह भी इस क्षेत्र में तेंदुओं की गतिविधियां बढ़ीं, जिससे ग्रामीण शाम ढलते ही घरों में कैद रहने लगे हैं।
  • अन्य संभावित घटनाएं: रुद्रप्रयाग और चमोली जैसे जिलों में भालू और तेंदुओं के हमलों की खबरें आईं। एक किसान अपने खेत जाते समय तेंदुए के हमले का शिकार हुआ। हालांकि पिछले ठीक सात दिनों में कोई नई बड़ी मौत रिपोर्ट नहीं हुई, लेकिन घायल होने और जानवरों के दर्शन की रोजाना घटनाएं जारी हैं। वन विभाग ने कुछ क्षेत्रों में ड्रोन और कैमरा ट्रैप लगाए, लेकिन ये प्रयास अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।

ये घटनाएं अकेली नहीं हैं। पूरे राज्य में 2000 से अब तक 900 से ज्यादा मौतें वन्यजीव हमलों में हुई हैं। तेंदुओं ने सबसे ज्यादा (548) मौतें कीं, उसके बाद हाथी (230), बाघ (106) और भालू (70)। 2025 में करीब 30 मौतें हुईं, जबकि 2026 के पहले तीन महीनों में ही 20 मौतें दर्ज हो चुकी हैं।

वन विभाग की लापरवाही: सिस्टम की गंभीर विफलता

उत्तराखंड वन विभाग पर लापरवाही के गंभीर आरोप लग रहे हैं:

  1. ट्रैपिंग और रिलोकेशन में देरी: समस्या वाले तेंदुओं या भालुओं को पकड़ने की प्रक्रिया लंबी खिंचती है। कई मामलों में फॉरेंसिक जांच के बाद जानवरों को ‘मैन ईटर’ नहीं माना जाता और उन्हें छोड़ दिया जाता है, जिससे हमले जारी रहते हैं। हाल ही में 12 तेंदुओं को एक साल कैद में रखने के बाद डीएनए टेस्ट से मैन ईटर नहीं पाया गया, लेकिन इस दौरान गांवों में दहशत बनी रही।
  2. स्टाफ और संसाधनों की कमी: स्थानीय लोग बताते हैं कि वन कर्मचारियों की संख्या अपर्याप्त है। गश्त नियमित नहीं होती। खतरे वाले 800 जोन चिन्हित किए गए हैं, लेकिन वहां सोलर लाइट्स, बाड़बंदी या रैपिड रिस्पॉन्स टीम नहीं पहुंच पाती।
  3. जागरूकता और रोकथाम की अनदेखी: वन मंत्री ने जागरूकता अभियान चलाने की बात कही, लेकिन जमीनी स्तर पर स्कूलों के पास या गांवों की सीमा पर सुरक्षा उपाय नहीं हैं। कई गांव ‘घोस्ट विलेज’ बनते जा रहे हैं क्योंकि परिवार पलायन कर रहे हैं।
  4. मुआवजा और पुनर्वास में सुस्ती: घायल या मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने में देरी होती है। 10 लाख रुपये की घोषणा हुई, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर।
  5. आवासीय विखंडन और मानवीय गतिविधियां: सड़क निर्माण, पर्यटन और कूड़े के कारण जानवर गांवों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन वन विभाग इन कारणों को नियंत्रित करने में नाकाम रहा।

पहाड़ी जनता पहले से बेरोजगारी, कृषि क्षति, पलायन, अस्पताल और शिक्षा की कमी से जूझ रही है। अब वन्यजीव हमले रोजाना महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की जान ले रहे हैं। महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं क्योंकि वे जंगलों में जाती हैं। स्कूल बंद हो रहे हैं, बच्चे पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं।

प्रभावित परिवारों की पीड़ा

  • घास काटने वाली महिला का परिवार: “वह रोज चारा लाती थी। अब हम क्या करें? वन विभाग सिर्फ आता है और चला जाता है।” परिवार सदमे में है और घायल महिला का इलाज चल रहा है।
  • पौड़ी के परिवार: 4 वर्षीय बच्ची की मौत के बाद गांव वाले कहते हैं, “तेंदुआ घर के पास आ गया। हमने पहले शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।”
  • नैनीताल के ग्रामीण: “रामनगर और नैनीताल में आतंक है। महिलाएं अब अकेले जंगल नहीं जातीं। पशु पालन भी बंद होने लगा है।”

ऐसी सैकड़ों कहानियां हैं। कई गांव खाली हो रहे हैं, जो पहाड़ी अर्थव्यवस्था और संस्कृति के लिए खतरा है।

सरकारी प्रयास और जनता की मांग

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बैठकें की हैं। वन विभाग ने 11 उच्च जोखिम वाले प्रभागों में विशेष अभियान शुरू किया है – अतिरिक्त स्टाफ, 24 घंटे गश्त, रैपिड रिस्पॉन्स टीम। स्कूल बच्चों को एस्कॉर्ट देने की योजना है। लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि ये कदम देर से और अपर्याप्त हैं।

जनता की मुख्य मांगें:

  • खतरे वाले क्षेत्रों में तुरंत बाड़बंदी, सोलर लाइट और कैमरा ट्रैप।
  • समस्या वाले जानवरों की त्वरित ट्रैपिंग या शूटिंग (कानूनी प्रक्रिया के तहत)।
  • प्रभावित परिवारों को तुरंत 10 लाख मुआवजा और पुनर्वास।
  • महिलाओं के लिए सुरक्षित चारा संग्रहण केंद्र और जागरूकता।
  • वन विभाग अधिकारियों की जवाबदेही तय करना – लापरवाही पर सस्पेंशन।
  • दीर्घकालिक समाधान: वन्यजीव कॉरिडोर प्रबंधन, मिश्रित वन रोपण, कूड़ा प्रबंधन।

सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे संघर्ष को प्राकृतिक आपदा मानकर मुआवजा बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।

समस्या के गहरे कारण

  • वन्यजीवों की बढ़ती आबादी और आवास संकुचन: संरक्षण सफल रहा, लेकिन मानव बस्तियां जंगलों के करीब आ गईं।
  • जलवायु परिवर्तन: मौसम बदलाव से भालुओं का हाइबरनेशन प्रभावित, वे गांवों की ओर आ रहे हैं।
  • कृषि और कूड़ा: फसलें और कचरा जानवरों को आकर्षित कर रहा है।
  • प्रशासनिक कमजोरी: वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय की कमी।

समाधान की राह

तात्कालिक: प्रभावित क्षेत्रों में विशेष टास्क फोर्स, हेलीकॉप्टर मेडिकल सहायता, महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सुरक्षित रोजगार।

दीर्घकालिक: कम्युनिटी भागीदारी, कार्यक्रमों का विस्तार, वैकल्पिक आजीविका (पर्यटन, हस्तशिल्प)।

वन विभाग को अपनी नाकामी स्वीकार कर त्वरित सुधार करना होगा। अन्यथा पहाड़ की जनता का विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा।

पहाड़ी लोग पहले से विकास की मुख्यधारा से कटे हुए हैं। बेरोजगारी ने युवाओं को शहर भेज दिया, कृषि नुकसान ने किसानों को हतोत्साहित किया। अब वन्यजीव हमले रोज निर्दोषों की जान ले रहे हैं। यह केवल पर्यावरण समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और प्रशासनिक संकट है।

सरकार और वन विभाग से जनता की पुकार है – लापरवाही बंद करो, जानें बचाओ, पहाड़ बचाओ। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो पलायन बढ़ेगा और गांव ‘भूतिया’ बनते जाएंगे।

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