बिंदुखट्टा (लालकुआं, नैनीताल), 19 अप्रैल 2026। उत्तराखंड के लालकुआं क्षेत्र के बिंदुखट्टा (शास्त्री नगर) में एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। 51 वर्षीय किसान पूरन सिंह बिष्ट ने अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। परिवार के अनुसार, 2014 में उनकी पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई थीं। उसके बाद से पूरन सिंह गहरे अवसाद (डिप्रेशन) में चले गए थे। वे अपने भाई के साथ रह रहे थे। शनिवार सुबह जब वे कमरे से बाहर नहीं निकले तो परिजनों ने दरवाजा तोड़ा। पूरन सिंह फंदे पर लटकते मिले। परिवार ने उन्हें तुरंत नीचे उतारा, लेकिन तब तक उनकी जान जा चुकी थी। कोतवाली प्रभारी निरीक्षक ब्रजमोहन सिंह राणा ने बताया, “प्रथम दृष्टया मामला अवसाद के चलते आत्महत्या का लग रहा है। पुलिस सभी पहलुओं की गहन जांच कर रही है।” शव का पोस्टमॉर्टम हल्द्वानी भेज दिया गया है।
यह घटना केवल एक परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है। यह उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में फैले मानसिक स्वास्थ्य संकट, परिवार विघटन और सामाजिक उपेक्षा का दर्दनाक उदाहरण है। आज हम इस घटना में समाज की भूमिका को विस्तार से समझेंगे और उन अन्य कारकों पर भी चर्चा करेंगे जिन्होंने इस दुखांत को आमंत्रित किया।
समाज की भूमिका: चुप्पी, कलंक और समर्थन की कमी
उत्तराखंड के पहाड़ी-तराई समाज में मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी “कमजोरी” या “पागलपन” समझा जाता है। पूरन सिंह बिष्ट जैसे लाखों किसान, मजदूर और आम आदमी जब परिवार टूटता है तो अकेले संघर्ष करते हैं, लेकिन समाज उनकी मदद करने के बजाय चुप रह जाता है। समाज की भूमिका यहां कई स्तरों पर नकारात्मक रही:
- मानसिक स्वास्थ्य पर कलंक (Stigma): ग्रामीण क्षेत्रों में डिप्रेशन को “मन की कमजोरी” कहा जाता है। पूरन सिंह 12 साल तक अवसाद झेलते रहे, लेकिन पड़ोसी, रिश्तेदार या गांव के बुजुर्गों ने उन्हें “समझाने” या “हौसला बढ़ाने” के अलावा कोई व्यावसायिक मदद नहीं दी। लोग कहते हैं – “घर की बात घर में रहने दो”, “पुरुष को रोना नहीं चाहिए”। इस कलंक के कारण पीड़ित खुद मदद मांगने से डरता है।
- परिवार और समुदाय का समर्थन न होना: जब पूरन सिंह की पत्नी 2014 में बच्चों को लेकर चली गईं, तो समाज ने उन्हें “परिवार जोड़ने” या काउंसलिंग का सुझाव नहीं दिया। इसके बजाय कई बार “आदमी को मजबूत रहना चाहिए” जैसे सलाहें दी जाती हैं। उत्तराखंड में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, लेकिन समाज नए सिंगल पेरेंट या अकेले पुरुषों के लिए कोई सहारा नहीं बन पाता। कोई महिला मंडल, युवा क्लब या गांव पंचायत ने पूरन सिंह से बात करने या उनकी मदद करने की पहल नहीं की।
- जागरूकता और संसाधनों की कमी: लालकुआं जैसे छोटे कस्बों में मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर, हेल्पलाइन या डिप्रेशन क्लिनिक की जानकारी तक नहीं पहुंचती। चाइल्डलाइन 1098 या टेली-मैनसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन (14416) के बारे में जागरूकता शून्य है। समाज स्कूलों, मंदिरों या चौपालों में मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा नहीं करता। नतीजा – लोग चुपचाप दर्द सहते रहते हैं।
- सामाजिक दबाव और अपमान: अलगाव के बाद पूरन सिंह को “घर टूटा हुआ” होने का अपमान भी सहना पड़ा होगा। समाज में “तलाक” या “पत्नी चली गई” को पुरुष के लिए “अपमान” माना जाता है। इस दबाव ने उनके अवसाद को और गहरा किया। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में आत्महत्या की दर ज्यादा होती है क्योंकि वे दर्द छुपाते हैं।
- सामूहिक जिम्मेदारी की अनदेखी: उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी और छोटे परिवारों की वजह से बुजुर्ग और अकेले लोग अकेले पड़ जाते हैं। समाज का रवैया “देखा-देखी” वाला है – जब तक कोई घटना नहीं होती, कोई हलचल नहीं। पूरन सिंह की मौत के बाद गांव में शोक है, लेकिन कल फिर वही चुप्पी छा जाएगी।
समाज की यह निष्क्रियता न सिर्फ पूरन सिंह बल्कि हजारों ऐसे परिवारों को मौत के मुंह में धकेल रही है।
अन्य कारक जो इस घटना को जन्म देते हैं
परिवार विघटन मुख्य कारण था, लेकिन कई अन्य कारक भी इसमें शामिल हैं:
- आर्थिक और कृषि संकट: पूरन सिंह किसान थे। उत्तराखंड में छोटी जोत, बढ़ती लागत, मौसम की अनियमितता और बाजार की अनिश्चितता से किसान पहले से तनाव में रहते हैं। पत्नी-बच्चों के जाने से घरेलू खर्च अकेले उठाना और भी मुश्किल हो गया होगा। कृषि आय कम होने से मानसिक दबाव बढ़ता है।
- पलायन और परिवार विघटन: उत्तराखंड में युवा और महिलाएं बेहतर रोजगार-शिक्षा के लिए मैदान या बाहर चले जाते हैं। 2014 में पत्नी का जाना इसी पलायन का हिस्सा हो सकता है। ग्रामीण परिवार टूट रहे हैं, लेकिन कोई नीति या सामाजिक कार्यक्रम उन्हें जोड़ने का काम नहीं कर रहा।
- स्वास्थ्य सेवाओं की कमी: लालकुआं-हल्द्वानी क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बहुत कम हैं। सरकारी अस्पतालों में डिप्रेशन की दवा तो मिलती है, लेकिन काउंसलिंग और फॉलो-अप नहीं। प्राइवेट इलाज महंगा है।
- शराब, अकेलापन और दैनिक जीवन का बोझ: कई मामलों में अकेले रहने वाले पुरुष शराब या अन्य नशे की ओर मुड़ जाते हैं, जो डिप्रेशन बढ़ाता है। पूरन सिंह के मामले में 12 साल का लंबा समय अकेलापन और दिन-रात की मेहनत ने उन्हें तोड़ दिया।
- सोशल मीडिया और बदलते मूल्य: आजकल परिवार के मुद्दे सोशल मीडिया पर भी चर्चा नहीं होते, बल्कि लोग “परफेक्ट फैमिली” दिखाते हैं। इससे असफलता का दर्द और बढ़ता है।
चुप्पी तोड़ो, मदद करो
पूरन सिंह बिष्ट की यह घटना केवल एक किसान की मौत नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। अगर हम समय रहते मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लें, परिवार टूटने पर काउंसलिंग उपलब्ध कराएं, गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाएं और “मर्द को रोना नहीं चाहिए” जैसी सोच बदलें, तो ऐसी घटनाएं रोकी जा सकती हैं।
सरकार और समाज से अपील:
- हर ब्लॉक में मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक खोले जाएं।
- स्कूलों और पंचायतों में डिप्रेशन जागरूकता कार्यक्रम चलाएं।
- हेल्पलाइन नंबर (14416, 1098) हर गांव में प्रचारित करें।
- परिवार विवाद में मध्यस्थता के लिए सामुदायिक फोरम बनाएं।
अगर कोई डिप्रेशन में है तो चुप मत रहिए। अपने नजदीकी से बात करें, डॉक्टर से मिलें या हेल्पलाइन पर कॉल करें। जीवन की कीमत परिवार, समाज और खुद से ज्यादा कुछ नहीं। पूरन सिंह जैसे कई अज्ञात नायक चुपचाप चले जाते हैं – अब समय आ गया है कि हम उनकी आवाज बनें।
सहायता चाहिए?
- टेली-मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन: 14416
- चाइल्डलाइन: 1098
- स्थानीय पुलिस या अस्पताल से संपर्क करें।
(घटना की जांच जारी है। आत्महत्या संवेदनशील विषय है। यदि आप या कोई परिचित संकट में है तो तुरंत मदद लें।)
