भारत में मेडिकल पाठ्यक्रमों (MBBS/BDS) में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली ‘राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा’ (NEET-UG) देश की सबसे बड़ी और अति-प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से एक है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक कांड, सॉल्वर गैंग और फर्जीवाड़े ने इस परीक्षा की साख तथा लाखों होनहार अभ्यर्थियों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
1. नीट (NEET) का इतिहास: ‘एक देश, एक परीक्षा’ का सफर
- AIPMT से NEET की शुरुआत: नीट से पहले देश में ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) और विभिन्न राज्यों की अपनी मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं आयोजित होती थीं।
- 2013 में पहली बार लागू: मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) और केंद्र सरकार ने 2013 में ‘एक देश, एक मेडिकल प्रवेश परीक्षा’ के रूप में NEET लागू किया। हालांकि, शुरुआत में कानूनी विवादों के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था।
- 2016 में अनिवार्य दर्जा: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद 2016 से पूरे देश में NEET को अनिवार्य कर दिया गया।
- NTA का गठन: 2017 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ (NTA) की स्थापना की गई, जिसने 2019 से NEET आयोजित करने की पूरी जिम्मेदारी संभाली।
2. पेपर लीक और फर्जीवाड़े का काला इतिहास
नीट का इतिहास विवादों से अछूता नहीं रहा है। वर्ष 2015 में (AIPMT के दौरान) बड़े पैमाने पर आंसर-की लीक होने के कारण सुप्रीम कोर्ट को दोबारा परीक्षा कराने का आदेश देना पड़ा था। इसके बाद से लगातार अलग-अलग तरीकों से धांधली सामने आती रही है:
- 2024 का नीट विवाद: 2024 की परीक्षा में एक ही सेंटर से कई टॉपर्स निकलने, ग्रेस मार्क्स के मनमाने बंटवारे और पटना (बिहार) व हजारीबाग (झारखंड) से प्रश्नपत्र लीक होने के खुलासे ने सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई (CBI) तक की जांच का मोड़ लिया।
- 2026 का हालिया संकट: मई 2026 में आयोजित नीट परीक्षा में राजस्थान के सीकर और अन्य इलाकों से गेस पेपर व उत्तर लीक होने के सबूत मिलने के बाद NTA को 3 मई 2026 की परीक्षा रद्द कर 21 जून को दोबारा परीक्षा (Re-exam) करानी पड़ी।
3. कैसे काम करता है ‘पेपर लीक सिंडिकेट’? (Mode of Operation)
देश में सक्रिय संगठित परीक्षा माफिया (Exam Mafia) एक सुनियोजित नेटवर्क की तरह काम करता है, जो करोड़ों रुपये के इस काले कारोबार को अंजाम देता है:
- प्रिंटिंग और ट्रांसपोर्टेशन ब्रीच: बैंक ट्रंक, लॉजिस्टिक्स या प्रिंटिंग प्रेस के निचले/सहानुभूति रखने वाले कर्मचारियों के माध्यम से पर्चे की फोटो या कॉपी चुराई जाती है।
- सॉल्वर गैंग (Solver Gangs): मेडिकल कॉलेजों के मेधावी छात्रों या कोचिंग शिक्षकों को भारी रकम देकर 1-2 घंटे के भीतर पूरे प्रश्नपत्र को हल (Solve) करवाया जाता है।
- डिजिटल डिस्ट्रीब्यूशन: हल किए गए पर्चे और आंसर-की को टेलीग्राम, व्हाट्सएप और डार्क वेब के गुप्त चैनलों के माध्यम से एजेंटों तक भेजा जाता है।
- रिजॉर्ट/सेफ हाउस में रटंत: चुनिंदा अभ्यर्थियों (जो 30 से 50 लाख रुपये तक देने को तैयार होते हैं) को रातभर किसी गुप्त स्थान या होटल में ले जाकर उत्तर रटवाए जाते हैं।
- सॉल्वर / डमी कैंडिडेट: कई बार अभ्यर्थियों के स्थान पर पैसे लेकर दूसरे योग्य मुन्नाबाइयों (Impersonators) को बायोमेट्रिक में हेरफेर करके परीक्षा केंद्र में बिठा दिया जाता है।
4. व्यवस्था में क्या बदलाव की जरूरत है?
- कठोर दंड एवं स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट: फास्ट-ट्रैक अदालतों (Fast-Track Special Courts) का गठन कर पेपर लीक के मामलों में 6 महीने के भीतर सजा और संपत्ति कुर्की का कड़ा प्रावधान हो।
- आउटसोर्सिंग पर रोक: संवेदनशील गोपनीय प्रक्रियाओं की जिम्मेदारी निजी व थर्ड-पार्टी एजेंसियों के बजाय केवल विश्वसनीय सरकारी सुरक्षा बलों और प्रिंटिंग सेटअप के पास होनी चाहिए।
- डिजिटल इंक्रिप्शन आधारित प्रश्नपत्र: लीक की गुंजाइश खत्म करने के लिए परीक्षा केंद्र पर डिजिटल चाबी (Key) के माध्यम से अंतिम 15 मिनट में सुरक्षित प्रिंटिंग तकनीक अपनाई जाए।