बेटे की अचानक मौत, सदमे में मां ने भी गंवाई जान—पिथौरागढ़ की त्रासदी ने व्यवस्था से पूछे कई सवाल

बेटे की अचानक मौत, सदमे में मां ने भी गंवाई जान—पिथौरागढ़ की त्रासदी ने व्यवस्था से पूछे कई सवाल

Takana Times- Pithoragarh| 20 Sept,26

पिथौरागढ़। सीमांत जिले में सामने आई मां-बेटे की दर्दनाक मौत ने केवल एक परिवार को नहीं तोड़ा, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था, मानसिक-सामाजिक सहायता और आपातकालीन सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मड़ेगांव निवासी 14 वर्षीय जतिन जोशी शनिवार सुबह दौड़ने गया था। दौड़ने के बाद अचानक उसकी तबीयत बिगड़ी और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। परिजन उसे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। बेटे की अचानक मौत के सदमे में मां पूनम जोशी उर्फ पुष्पा ने कुछ समय बाद सरयू नदी में छलांग लगा दी। बचाव के प्रयासों के बावजूद उनकी जान नहीं बच सकी।

आखिर 14 साल के बच्चे की अचानक मौत क्यों?

प्रारंभिक रिपोर्टों में हृदय संबंधी समस्या की आशंका बताई गई है, लेकिन मौत का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही स्पष्ट होगा। सवाल है—क्या बच्चे की पहले कभी स्वास्थ्य जांच हुई थी? क्या स्कूलों में खेलकूद से पहले बच्चों की बेसिक मेडिकल स्क्रीनिंग होती है? और यदि मैदान में अचानक ऐसी आपात स्थिति आए तो क्या तत्काल प्राथमिक उपचार और जीवनरक्षक सुविधाएं मौजूद हैं?

हालांकि स्थानीयों के अनुसार संभवतः बच्चे को हार्ट अटैक पड़ा, लेकिन इस छोटी उम्र में बच्चों को हार्ट अटैक होना गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है। अनगिनत केसेस के बावजूद सरकारें और प्रशासन आँख-कान मूंदे पड़ा हुआ है। आवश्यक है कि सभी नागरिकों को स्क्रीनिंग कराई जाए ताकि बड़े स्तर पर हो रहे हार्ट अटैक और आकस्मिक मौतें रोकी जा सके।

बेटे की मौत के बाद मां को कौन संभालता?

रिपोर्टों के अनुसार मां पहले भी एक बेटी को खो चुकी थीं। ऐसे में बेटे की अचानक मौत उनके लिए अत्यंत गंभीर मानसिक आघात रही होगी। वहीं महिला के पति सेना में हैं और महिला की एक बड़ी बेटी दूसरे में शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। गांववासी इस घटना से स्तब्ध हैं।

यहीं सबसे बड़ा सामाजिक सवाल सामने आता है—अचानक किसी अपने को खोने वाले व्यक्ति को क्या हम सिर्फ सांत्वना देकर अकेला छोड़ देते हैं?

अस्पतालों और प्रशासन के पास ऐसी घटनाओं के बाद परिवार को तत्काल काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और जोखिम की पहचान देने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

यह घटना बताती है कि आपदा केवल पहाड़ों में नहीं आती—कभी-कभी वह एक परिवार के भीतर अचानक टूटती है। जरूरत है कि उत्तराखंड में स्कूल हेल्थ स्क्रीनिंग, आपातकालीन चिकित्सा और शोकग्रस्त परिवारों के लिए मानसिक-सामाजिक सहायता को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए।

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