AIBE के बिना वकालत पर केरल हाईकोर्ट की सख्ती, अब उत्तराखंड में भी उठे सवाल

AIBE के बिना वकालत पर केरल हाईकोर्ट की सख्ती, अब उत्तराखंड में भी उठे सवाल

फर्जी डिग्री से लेकर बिना वैध Certificate of Practice तक—न्याय के पेशे में प्रवेश की जांच क्यों जरूरी?

Takana Times- Dehradun/Pithoragarh|

न्याय व्यवस्था में आम नागरिक सबसे ज्यादा भरोसा जिस पेशे पर करता है, वह है अधिवक्ता। लेकिन यदि कोई व्यक्ति आवश्यक परीक्षा पास किए बिना या वैध Certificate of Practice (CoP) के बिना अदालत में वकालत कर रहा हो, तो सवाल केवल एक व्यक्ति की पात्रता का नहीं रह जाता—यह सीधे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ जाता है।

केरल हाईकोर्ट ने इसी गंभीर मुद्दे पर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 23 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति स्याम कुमार वी.एम. की पीठ ने Bar Council of Kerala को 2021 के बाद AIBE उत्तीर्ण न करने वाले अथवा आवश्यक CoP प्राप्त न करने वाले अधिवक्ताओं की सूची अपडेट कर आठ सप्ताह के भीतर प्रकाशित करने का निर्देश दिया। साथ ही ऐसी स्थिति की नियमित समीक्षा जारी रखने को कहा गया है।

इससे पहले केरल हाईकोर्ट ने 2010 से दिसंबर 2021 के बीच नामांकित करीब 1,157 अधिवक्ताओं के संबंध में कार्रवाई के निर्देश दिए थे। अदालत की चिंता यह थी कि बिना आवश्यक पात्रता/CoP के अधिवक्ता न्यायिक कार्यवाही में उपस्थित न हों।

सवाल उत्तराखंड से भी

अब इसी तर्ज पर उत्तराखंड हाईकोर्ट और Bar Council of Uttarakhand के सामने भी एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—क्या उत्तराखंड में भी यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति जो अदालत में अधिवक्ता के रूप में पेश हो रहा है, उसकी शैक्षणिक योग्यता, Bar Council enrolment, AIBE स्थिति और Certificate of Practice की स्थिति पूरी तरह सत्यापित है?

Bar Council of Uttarakhand के उपलब्ध पंजीकरण निर्देशों में भी स्पष्ट किया गया है कि 12 जून 2010 के बाद विधि स्नातक करने वाले अभ्यर्थियों का अस्थायी पंजीकरण दो वर्ष के लिए होता है और इस अवधि में AIBE उत्तीर्ण करना आवश्यक बताया गया है। निर्देशों में यह भी कहा गया है कि AIBE उत्तीर्ण न होने पर स्थायी पंजीकरण प्रदान नहीं किया जाएगा और संबंधित न्यायालयों को इसकी सूचना दी जाएगी।

अर्थात व्यवस्था में नियम मौजूद हैं। अब असली सवाल उनके प्रभावी अनुपालन और निगरानी का है।

केवल AIBE ही नहीं, फर्जी डिग्री पर भी हो जांच

यह मामला एक और बड़े खतरे की ओर ध्यान खींचता है—फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र और डिग्री।

यदि किसी व्यक्ति की कानून की डिग्री ही संदिग्ध है, विश्वविद्यालय का रिकॉर्ड सत्यापित नहीं है, enrolment दस्तावेजों में विसंगति है या किसी अन्य माध्यम से पेशे में प्रवेश हासिल किया गया है, तो ऐसी स्थिति में केवल AIBE रिकॉर्ड की जांच पर्याप्त नहीं होगी।

उत्तराखंड में एक व्यापक verification mechanism की जरूरत है जिसमें—

  • कानून की डिग्री और विश्वविद्यालय रिकॉर्ड का सत्यापन हो।
  • Bar Council enrolment की जांच हो।
  • AIBE qualification की स्थिति जांची जाए।
  • Certificate of Practice की वैधता जांची जाए।
  • लंबे समय से practice कर रहे अधिवक्ताओं के रिकॉर्ड का periodic audit हो।
  • फर्जी दस्तावेज मिलने पर संबंधित संस्थान और व्यक्ति की जिम्मेदारी तय हो।
  • संदिग्ध मामलों की सूची न्यायालयों और संबंधित प्राधिकरणों के साथ साझा की जाए।

कानून के पेशे को दबाव या हथियार बनाने का खतरा

कानूनी पेशा नागरिकों को न्याय दिलाने का माध्यम है। लेकिन यदि कोई अयोग्य या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पेशे में प्रवेश कर लेता है, तो कानून की जानकारी और न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल दबाव बनाने, मुकदमों को प्रभावित करने या आम नागरिक को डराने के माध्यम के रूप में किए जाने का जोखिम पैदा हो सकता है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर AIBE-अनुत्तीर्ण व्यक्ति फर्जी या आपराधिक नहीं होता, और केवल किसी अधिवक्ता के AIBE रिकॉर्ड में कमी अपने-आप में फर्जी डिग्री का प्रमाण नहीं है। दोनों मुद्दों की अलग-अलग जांच आवश्यक है।

लेकिन जहां पात्रता संबंधी नियम लागू हैं, वहां उनकी निगरानी कमजोर नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उत्तराखंड में कई मामलों में वकील के पेशे में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग शामिल पाए गए हैं जिससे आम नागरिकों में पेशे को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों की राय देखने को मिलती है।

उत्तराखंड में क्या हो सकता है?

केरल हाईकोर्ट की कार्रवाई से सीख लेते हुए उत्तराखंड में भी एक पारदर्शी Advocate Verification Drive पर विचार किया जा सकता है।

Bar Council of Uttarakhand द्वारा जिलेवार यह सार्वजनिक किया जा सकता है कि संबंधित अधिवक्ता का enrolment status, AIBE status और CoP status क्या है। संदिग्ध मामलों में विश्वविद्यालयों से सीधे दस्तावेजों का सत्यापन कराया जा सकता है।

साथ ही उत्तराखंड हाईकोर्ट की निगरानी में यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि जिन व्यक्तियों के संबंध में वैध practice की पात्रता नहीं है, उनके मामलों में नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई हो।

सवाल सिर्फ वकीलों का नहीं, न्याय के भरोसे का है

न्यायालय में पहुंचने वाला आम व्यक्ति अक्सर कानून की बारीकियों से अनजान होता है। वह अपने अधिवक्ता पर विश्वास करता है कि जिस व्यक्ति को वह अपनी जिंदगी, संपत्ति, स्वतंत्रता या परिवार से जुड़े मामले की जिम्मेदारी दे रहा है, वह विधि के अनुसार अधिकृत और योग्य है।

इसलिए फर्जी डिग्री, गलत enrolment या बिना वैध CoP के practice जैसी किसी भी संभावना की जांच को पेशे के खिलाफ कदम नहीं, बल्कि पेशे की विश्वसनीयता मजबूत करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

केरल हाईकोर्ट ने अब इस दिशा में एक स्पष्ट मॉडल सामने रखा है।
क्या उत्तराखंड भी अपने यहां AIBE, CoP, enrolment और law-degree verification का व्यापक audit करेगा?

यही वह सवाल है जिसका जवाब उत्तराखंड के आम नागरिकों और न्याय व्यवस्था—दोनों के हित में जरूरी है।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *