स्कूलों, कॉलेजों और समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचा नशामुक्ति का संदेश; युवाओं का भविष्य बचाने की इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन मिलने की जरूरत।
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में नशे के खिलाफ जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की मुहिम चर्चा और सराहना का विषय है। नशे की बढ़ती चुनौती के बीच युवाओं को इस बुराई से दूर रखने और समाज में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रशासन की सक्रियता बेहद महत्वपूर्ण है। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, जिलाधिकारी के रूप में शुरुआती दो महीनों में डॉ. आशीष चौहान ने नशे के खिलाफ जिले में 200 से अधिक बैठकें की हैं। यह अभियान स्कूलों, कॉलेजों और समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाया जा रहा है।
युवाओं के भविष्य के लिए प्रशासन की पहल
नशा केवल एक व्यक्ति की आदत नहीं, बल्कि परिवार, समाज और देश के भविष्य को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्या है। इसकी चपेट में आने वाले युवाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पारिवारिक जीवन पर दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। ऐसे में प्रशासन की भूमिका केवल नशे के कारोबार के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जागरूकता, रोकथाम और उपचार को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
डॉ. आशीष चौहान की इस मुहिम का महत्वपूर्ण पहलू शिक्षण संस्थानों तक नशे के खिलाफ संदेश पहुंचाना है। स्कूलों और कॉलेजों में विद्यार्थियों को नशे के दुष्परिणामों से अवगत कराना, उन्हें गलत संगति और दबाव से बचने के लिए तैयार करना तथा अभिभावकों को जागरूक करना समय की जरूरत है।
यदि विद्यार्थियों को शुरुआती स्तर पर सही मार्गदर्शन, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता और सकारात्मक वातावरण मिले, तो उन्हें नशे से दूर रखने में मदद मिल सकती है।
200 से अधिक बैठकें: निरंतरता और परिणाम दोनों जरूरी
दो महीनों में 200 से अधिक बैठकों का दावा प्रशासनिक सक्रियता के पैमाने पर महत्वपूर्ण है। हालांकि, ऐसे अभियान की वास्तविक सफलता का आकलन केवल बैठकों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके परिणामों से भी होना चाहिए, जिसके लिए वह स्वयं लगातार स्कूल कॉलेजों में पहुंचकर हर छात्र और माता-पिता जागरूकता फैला रहे हैं। इसके साथ ही हर विभाग के साथ समन्वय कर वो लगातार स्वयं ही इसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं ।

डॉ. आशीष चौहान के प्रयास सराहनीय, दूसरे जिलों के लिए बन सकता है उदाहरण
जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दों पर प्रशासनिक नेतृत्व की सक्रियता सकारात्मक संदेश देती है। नशे के खिलाफ लगातार बैठकें करना, विभिन्न संस्थानों को जोड़ना और समाज को जागरूक करने का प्रयास ऐसी पहल है, जिसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए। राज्य के लोग इस बात से अवगत हैं कि नशे का नेटवर्क देहरादून में जिस हद तक पैर पसारे है, उससे नई पीढ़ी सबसे अधिक प्रभावित हुई है। इसके लिए खासकर देहरादून को टारगेट किया जाता है क्योंकि यह शिक्षा का हब भी है और देश विदेश के बच्चे भी यहां पहुंचते हैं, जो आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं और नशे के सौदागरों का यही सबसे बड़ा टारगेट होता है।
यदि इस अभियान के माध्यम से नशे की उपलब्धता में कमी आती है, युवाओं में जागरूकता बढ़ती है और जरूरतमंद लोगों को समय पर उपचार मिलता है, तो देहरादून का अनुभव दूसरे जिलों के लिए भी उपयोगी मॉडल बन सकता है।
ऐसे प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने के साथ-साथ उनकी प्रभावशीलता का स्वतंत्र मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए, ताकि सफल रणनीतियों को अन्य राज्यों में अपनाया जा सके।
नशामुक्त देहरादून के लिए जनता भी निभाए जिम्मेदारी
नशे के खिलाफ लड़ाई केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। अभिभावकों को बच्चों के साथ खुलकर संवाद करना चाहिए। शिक्षकों को विद्यार्थियों के व्यवहार में गंभीर बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। नागरिकों को अवैध नशे के कारोबार की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचानी चाहिए। वहीं, नशे की लत से जूझ रहे लोगों को अपमानित करने के बजाय उचित उपचार और परामर्श के लिए प्रेरित करना चाहिए। तेजी से बदलते समय में आज के माता- पिता और परिवार को जागरूक होने की आवश्यकता है।
